मक्का समझौता: भारत ने अगर ऑपरेशन सिंदूर की तरह कोई कार्रवाई की तो क्या तुर्की और सऊदी पाकिस्तान का साथ देंगे?

इमेज स्रोत, SPA
सऊदी अरब के मक्का शहर में शुक्रवार को सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने एक रक्षा समझौते पर दस्तख़्त किए.
इस समझौते के मुताबिक़ इनमें से किसी एक पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा.
थिंक टैंक द ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान कहती हैं कि पाकिस्तान शीत युद्ध के दौरान बने सैन्य गठजोड़ सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन और साउथ एशिया ट्रीटी ऑर्गोनाइजेशन में शामिल होने के सात दशक बाद एक नए सैन्य गठजोड़ में शामिल हो रहा है.
तन्वी मदान ने लिखा है, ''एसईएटीओ के अनुच्छेद चार में पारस्परिक रक्षा का प्रावधान था. हालांकि अमेरिका ने इसमें कुछ शर्तें जोड़ रखी थीं. मसलन, भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में अमेरिका ख़ुद को उसमें शामिल होने से बचा सकता था. वहीं, पाकिस्तान ने अमेरिका के उन अनुरोधों को ठुकरा दिया था, जिनमें उसे वियतनाम युद्ध में योगदान देने को कहा गया था.''
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या तुर्की और सऊदी अरब भारत से संघर्ष की स्थिति में पाकिस्तान का साथ देंगे?
इसराइली पोडकास्टर और प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के दूसरे बेटे याइर नेतन्याहू ने इस समझौते पर पूछा है, ''तो अगली बार जब ईरान, हूती या इराक़ में मौजूद मिलिशिया सऊदी अरब पर हमला करेंगे, तो क्या तुर्की और पाकिस्तान ईरान, इराक़ और यमन पर हमला करेंगे? जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध होगा, तो क्या तुर्की और सऊदी अरब भारत पर हमला करेंगे?''
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को चीन और तुर्की से मदद मिली थी.
पाकिस्तान ने वह युद्ध अपनी सेना और दूसरे देशों के रक्षा उपकरणों के दम पर लड़ा. ऐसे में सवाल उठता है कि सऊदी अरब और तुर्की के साथ रक्षा समझौता पाकिस्तान की क्षमता में क्या जोड़ सकता है और क्या नहीं.
भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता है और कहा जाता है कि उसकी परमाणु नीति केवल भारत पर केंद्रित है. मक्का में हुआ कोई भी समझौता इस समीकरण को नहीं बदलता.
समझौता जिस चीज़ को स्थायी रूप देता है, वह समर्थन है, जिसने सिंदूर के दौरान यह तय करने में भूमिका निभाई कि पाकिस्तान को सैन्य मदद कैसे मिली और उसके पक्ष को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किस तरह पेश किया गया.

इमेज स्रोत, SPA
सऊदी से संबंधों पर असर
भारत-पाकिस्तान संकट में सऊदी अरब का महत्व दिल्ली के अपने आर्थिक समीकरणों से जुड़ा है. भारत और सऊदी अरब में 43 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार है. सऊदी ने भारत में ऊर्जा, रिफाइनिंग, पेट्रोकेमिकल्स और इन्फ़्रास्ट्रक्चर में 100 अरब डॉलर तक के निवेश की मंशा जाहिर की है.
भारत के पश्चिमी तट पर बड़े डाउनस्ट्रीम प्रोजेक्ट्स में सऊदी की अरामको की भी भागीदारी है. सऊदी अरब में 25 लाख से ज़्यादा भारतीय काम करते हैं. सऊदी का कच्चा तेल भारत के ऊर्जा आयात का एक अहम हिस्सा है.
भारत में वर्षों से इन आँकड़ों को सऊदी से रिश्तों की गहराई के प्रमाण के तौर पर देखा जाता रहा है. क्या पाकिस्तान के साथ डिफेंस पैक्ट से संबंधों पर असर पड़ेगा? जिस सऊदी अरब के पास इन सभी आर्थिक और कूटनीतिक साधनों की ताक़त है, उसने अब संधि के ज़रिए दो बार, 11 महीनों के भीतर, अपनी सुरक्षा को पाकिस्तान की सुरक्षा से जोड़ दिया है.
तुर्की की पत्रकार और ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूशन की अस्ली आयदिन तब्स मानती हैं कि इसे अभी मुस्लिम नेटो या सुन्नी नेटो कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह ज़रूर संकेत देता है कि क्षेत्रीय देशों के स्वामित्व वाली एक क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था विकसित करने की इच्छा है.
आयदिन ने लिखा है, ''इस समझौते का मक़सद प्रतिरोधक क्षमता मज़बूत करना है, ज़रूरी नहीं कि युद्ध का दायरा बढ़ाना. तुर्की और पाकिस्तान ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध नहीं लड़ेंगे. दोनों देश ख़ुद को स्थिरता कायम करने वाले देशों के रूप में देखते हैं और इसके लिए राजनीतिक माहौल तैयार करना चाहते हैं.''
आयदिन मानती हैं, ''इसराइल और ईरान के लिए यह मानना ग़लती होगी कि इस समझौते का उनसे कोई लेना-देना नहीं है. राजनीतिक स्तर पर यह संकेत देता है कि इन देशों को तब तक राजनीतिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश की जा सकती है, जब तक उनकी नीतियां कम आक्रामक और क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में अधिक केंद्रित नहीं हो जातीं.''
अमेरिका इस समझौते को कैसे देखेगा? आयदिन कहती हैं, ''तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी तीनों अमेरिका के अहम सहयोगी हैं. तीन प्रमुख अमेरिकी सहयोगियों के बीच किसी क्षेत्रीय समझौते या क्षेत्रीय समाधान से वॉशिंगटन को कोई आपत्ति नहीं है. अमेरिका इसे बोझ साझा करने की दिशा में एक क़दम के तौर पर देखता है और इसका स्वागत करता है. हालांकि, यह समझौता खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा प्रदाता के रूप में अमेरिका की भूमिका की जगह नहीं लेता.''

इमेज स्रोत, SPA
तुर्की ने क्या कहा?
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप्प अर्दोआन ने कहा है कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ समझौते का मक़सद किसी देश को निशाना बनाना नहीं है.
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पहले से ही रक्षा समझौता है. अब इस पैक्ट में तुर्की भी शामिल हो गया है.
सऊदी अरब के पास वित्तीय ताक़त है. पाकिस्तान के पास परमाणु क्षमता, बैलिस्टिक मिसाइलें और मानव संसाधन हैं जबकि तुर्की के पास सैन्य अनुभव है और उसने एक रक्षा उद्योग विकसित किया है.
तुर्की के राष्ट्रपति समझौते के बाद सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा कि ये किसी देश के ख़िलाफ़ गठबंधन नहीं है.

उन्होंने लिखा, '' ये समझौता संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के मुताबिक़ है, जिसमें आत्मरक्षा का अधिकार शामिल है. इस समझौते का मक़सद किसी देश को निशाना बनाना नहीं है. इसमें वो सभी मित्र देश शामिल हो सकते हैं जो हमारे क्षेत्र में शांति, समृद्धि और स्थिरता चाहते हैं.''
''इससे हमारी सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग को आगे बढ़ाने, रक्षा उद्योग में संयुक्त परियोजनाओं को विकसित करने और आतंकवाद से मुक़ाबला करने में मदद मिलेगी.''
लेकिन भारत के लिए ये सैन्य गठबंधन चिंता की वजह बन सकता है. क्योंकि इसमें शामिल दो देशों पाकिस्तान और तुर्की के साथ भारत के दोस्ताना रिश्ते नहीं है.
कई विश्लेषकों का मानना है समझौते से पैदा इन आशंकाओं ने निश्चित तौर पर भारत की चिंता बढ़ाई है.
भारत के लिए बड़ी चिंता?

इमेज स्रोत, EPA/Reuters
सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी कहते हैं, ''इससे भविष्य में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान डेटरेंस और तनाव बढ़ने से रोकने की रणनीति और जटिल हो सकती है.''
चेलानी ने एक्स पर लिखा है, ''हालांकि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को चीन से तुर्की की तुलना में कहीं अधिक सैन्य सहायता मिली थी, लेकिन तुर्की की प्रत्यक्ष मदद ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत के साथ संघर्ष की स्थिति में तुर्की पाकिस्तान का समर्थन करने को तैयार है.''
''भविष्य में अगर भारत ऑपरेशन सिंदूर की तरह पाकिस्तान में आतंकी ढांचे या सैन्य ठिकानों पर कोई दंडात्मक कार्रवाई करता है, तो सैद्धांतिक रूप से इस्लामाबाद इसे युद्ध की कार्रवाई के रूप में पेश कर सकता है और समझौते के सामूहिक रक्षा प्रावधानों को लागू करने की मांग कर सकता है.''
संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व राजदूत टीएस तिरुमूर्ति भी मानते है कि यह समझौता भारत के हक़ में नहीं है.
तिरुमूर्ति ने लिखा है, ''फ़रवरी के अंत में ईरान युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद, मैंने 10 मार्च को 'द हिंदू' में लिखा था, ''तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान को इसका फ़ायदा होगा. क्षेत्र में अपनी महत्वाकांक्षाओं और प्रभाव को बढ़ाने के लिए उनके पास अधिक जगह बनेगी. और यह भारत के लिए अच्छी ख़बर नहीं है. अब लगता है कि वही बात सच साबित हो रही है."

भारतीय थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में मिडिल ईस्ट प्रोग्राम के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर कबीर तनेजा ने एक्स पर लिखा, ''तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए नए रक्षा समझौते में नेटो के आर्टिकल 5 जैसी भाषा का इस्तेमाल किया गया है. हालांकि ज़्यादातर लोग इसे मध्य-पूर्व के नज़रिए से देख रहे हैं, लेकिन इसका असर दूसरे क्षेत्रों पर भी पड़ेगा. पाकिस्तान और भारत के बीच लंबे समय से चले आ रहे संघर्षपूर्ण संबंध के नज़रिये से भी इसे देखना होगा.''
क्या पाकिस्तान की अहमियत बढ़ रही है?

इमेज स्रोत, Getty Images
थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल में साउथ एशिया मामलों के सीनियर फेलो माइकल कुगलमैन मानते हैं कि पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुआ समझौता पिछले कुछ महीनों में इन तीनों देशों के बीच गहरे होते सुरक्षा संबंधों का स्वाभाविक नतीजा है.
कुगलमैन कहते हैं, ''इसका फोकस सामूहिक क्षेत्रीय प्रतिरोध पर है और इसमें ईरान को ध्यान में रखा गया है. अमेरिका में इस समझौते का स्वागत होगा क्योंकि अमेरिका अपने प्रमुख सहयोगियों से क्षेत्रीय सुरक्षा की ज़िम्मेदारी में ज़्यादा हिस्सेदारी की उम्मीद करता है.''
उन्होंने इसमें पाकिस्तान की भूमिका का ज़िक्र करते हुए लिखा, ''यह समझौता मध्य पूर्व की उभरती सुरक्षा व्यवस्था में पाकिस्तान की भूमिका को और मज़बूत करता है. पाकिस्तान हाल के दिनों में मिस्र और जॉर्डन जैसे मध्य-पूर्व के अन्य प्रभावशाली देशों के साथ भी अपने सुरक्षा संबंध मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है. इससे मध्य-पूर्व में पाकिस्तान की रणनीतिक अहमियत बढ़ रही है.''

युद्ध विश्लेषक जॉन स्पेंसर ने एक्स इसे ख़राब आइडिया के रूप में देख रहे हैं. उन्होंने लिखा है, ''यह एक बेहद ख़राब आइडिया है. पाकिस्तान अब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घोषित आतंकवादी संगठनों को पनाह देता है. सीमा पार हमले करने वाले आतंकवादी समूहों के ख़िलाफ़ न तो वह ज़िम्मेदारी लेता है और न ही कोई कार्रवाई करता है.''
''वह चीन पर निर्भर है और उसकी सेना बड़े पैमाने पर चीन के हथियारों से लैस है. इसके अलावा, उसकी अर्थव्यवस्था बेहद कमज़ोर है. बल्कि उसे विफल होती अर्थव्यवस्था वाला देश भी कहा जा सकता है, जिसे बार-बार आईएमफ से राहत पैकेज की ज़रूरत पड़ी है.''
''पाकिस्तान एक ऐसा देश जिसके साथ सबसे आख़िर में किसी नेटो सदस्य को आर्टिकल 5 जैसी रक्षा प्रतिबद्धता वाला समझौता करना चाहिए.''
''जब ईरान ने सऊदी अरब पर हमला किया, तब पाकिस्तान ने उसकी मदद के लिए कुछ नहीं किया.''
क्या ये पैन इस्लामिक गठबंधन है?

कुछ विश्लेषकों की नज़र में ये एक इस्लामी गठबंधन है. इसमें तुर्की की भूमिका का ज़िक्र करते हुए भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने एक्स पर लिखा, ''अर्दोआन जानते हैं कि वह हमेशा की तरह छल से भरी कूटनीति कर रहे हैं. अगर यह रक्षा समझौता किसी के ख़िलाफ़ नहीं है, तो फिर इसकी ज़रूरत ही क्यों पड़ी? क्या यह ऐसे ख़तरे से निपटने के लिए है, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है?''
''अर्दोआन लंबे समय से पश्चिम एशिया में तुर्की की क्षेत्रीय भूमिका को मज़बूत करने की कोशिश करते रहे हैं. इस क्षेत्र पर कभी सदियों तक ऑटोमन साम्राज्य का शासन रहा था. अर्दोआन इस्लामी दुनिया का नेतृत्व करना चाहते हैं. उन्होंने सऊदी अरब की इस्लामी सुधारवादी नेतृत्व की भूमिका को कमज़ोर करने और अपनी अगुआई में पाकिस्तान और मलेशिया को साथ लेकर एक रूढ़िवादी इस्लामी गुट बनाने की कोशिश की है.''
''अब वह सऊदी अरब को भी अपने साथ जोड़कर मुस्लिम ब्रदरहुड से प्रेरित अपनी राजनीतिक नेतृत्व की परियोजना को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं.''

ब्रह्मा चेलानी भी इससे सहमत हैं. उन्होंने लिखा, ''समझौते में 'इस्लामी एकजुटता' का साफ़ ज़िक्र और इस पर मक्का में दस्तख़्त इस नए रक्षा गठजोड़ को स्पष्ट रूप से पैन-इस्लामिक चरित्र देता है.''
मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट में तुर्की प्रोग्राम की फ़ाउंडर डायरेक्टर गोनुल तोल ने एक्स पर लिखा, '' आज मक्का में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए रक्षा समझौते को देखते हुए मैं जनवरी में लिखी अपनी पोस्ट फिर से साझा कर रही हूँ. मेरा आकलन अब भी कायम है.''
''इस समझौते कुछ प्रतीकात्मक महत्व भी जुड़े हैं. जैसे इस पर शुक्रवार को, यानी मुसलमानों के पवित्र नमाज़ के दिन और मक्का में दस्तख्त करना. नेटो के अनुच्छेद 5 चैसी चीज़ को भी शामिल किया गया है. मेरा मानना है कि यह समझौता मुख्य रूप से पहले से मौजूद रक्षा साझेदारियों को संस्थागत रूप देता है.
''लेकिन इसे मुस्लिम नेटो कहना अब भी बहुत महत्वाकांक्षी दावा होगा.''
''2025 के सऊदी अरब-पाकिस्तान रक्षा समझौते में भी सामूहिक रक्षा का प्रावधान था. लेकिन जब सऊदी अरब पर हमला हुआ, तब इससे पाकिस्तान की ओर से अपने-आप सैन्य कार्रवाई शुरू नहीं हुई.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.



























