सऊदी अरब ईरान से सीधे लड़ने से क्यों बचता है, 10 गुना ज़्यादा क़ीमत पर क्यों ख़रीद रहा है ड्रोन?

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इमेज कैप्शन, 1990 के खाड़ी युद्ध के दौरान कुवैत सीमा पर प्रशिक्षण लेते सऊदी सैनिक (फाइल फोटो)
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सऊदी अरब पिछले महीने ताइवान से ड्रोन ख़रीदने वाला सबसे बड़ा ख़रीदार बन गया.

अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग के अनुसार, उसने रिकॉर्ड संख्या में ड्रोन ख़रीदे और हर ड्रोन के लिए दूसरे देशों की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक क़ीमत चुकाई.

ताइपे के वित्त मंत्रालय की ओर से पिछले सप्ताह जारी आंकड़ों के मुताबिक, सऊदी अरब ने 4.72 करोड़ डॉलर क़ीमत के ड्रोन खरीदे.

जून 2023 से उपलब्ध आंकड़ों में यह किसी भी देश की ओर से एक महीने में की गई सबसे बड़ी ख़रीद है.

ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''यह स्पष्ट नहीं है कि सऊदी अरब इन ड्रोन का इस्तेमाल किस मक़सद से करेगा. इनका औसत वजन 7 से 15 किलोग्राम के बीच है और इनका उपयोग इंडस्ट्री के अलावा सैन्य कामों में भी किया जा सकता है.''

''आंकड़ों के अनुसार, सऊदी अरब ने 3,260 ड्रोन के लिए औसतन 14,472 डॉलर प्रति ड्रोन चुकाए जबकि इसी श्रेणी के दूसरे बाज़ारों को निर्यात किए गए ड्रोन की औसत क़ीमत 1,464 डॉलर प्रति ड्रोन रही.''

ईरान और सऊदी अरब के बीच अविश्वास तो दशकों पुराना है लेकिन ईरानी हमले से सऊदी अरब काफ़ी हद तक बचा रहता था.

हालाँकि यह स्थिति 28 फ़रवरी से पूरी तरह बदल गई, जब अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमले शुरू किए.

ईरान ने जवाबी कार्रवाई में युद्ध के दौरान किए गए अपने कुल मिसाइल और ड्रोन हमलों में ज़्यादातर हमले गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) के देशों पर किए. इनमें संयुक्त अरब अमीरात पर सबसे ज़्यादा हमले हुए. सऊदी अरब भी निशाना बना.

इस युद्ध के झटके और भविष्य में संभावित हमलों की आशंका ने उस सुरक्षा को चुनौती दी है, जिसे ख़ास तौर पर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालने के लिए वर्षों की मेहनत और अरबों डॉलर के निवेश से तैयार किया था.

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इमेज कैप्शन, ऑपरेशन डेज़र्ट शील्ड के दौरान अमेरिकी कमांडर जनरल नॉर्मन श्वार्ज़कॉफ़ (दाएं) अमेरिकी सेना की एक चौकी के दौरे के दौरान एक सऊदी सैनिक के साथ. (फ़ाइल फ़ोटो)

अमेरिका को लेकर बढ़ता अविश्वास

अब खाड़ी देशों के सामने एक विरोधाभास है. अपनी सुरक्षा के लिए वे अमेरिका पर निर्भर हैं और फ़िलहाल इसका कोई बेहतर विकल्प भी नहीं है.

लेकिन दूसरी ओर, इस युद्ध में अमेरिका और इसराइल की कार्रवाइयों ने खाड़ी देशों के लिए नई सुरक्षा चुनौतियां पैदा कर दी हैं.

युद्ध के दौरान अमेरिका, सऊदी अरब और यूएई पर हमले रोकने में नाकाम रहा है. दूसरी तरफ़ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को ओवल ऑफिस में पत्रकारों से कहा कि वह चाहते हैं कि खाड़ी के देश होर्मुज़ स्ट्रेट की सुरक्षा में अमेरिका की मदद के बदले भुगतान करें.

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इमेज कैप्शन, 17 अप्रैल 2025 को तेहरान की यात्रा के दौरान सऊदी के रक्षा मंत्री ख़ालिद बिन सलमान ने ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई से मुलाक़ात की और उन्हें सऊदी शाह सलमान बिन अब्दुलअज़ीज़ का पत्र सौंपा था (फ़ाइल फ़ोटो)
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10 जुलाई को अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने एक्स पर लिखा था कि यूएस के सहयोगी देशों में अविश्वास बढ़ रहा है.

ब्लिंकन ने लिखा था, ''सहयोगियों से रिश्ते कभी भी दान या एहसान के आधार पर नहीं बने थे. इन्हें दूरदर्शी हितों के तहत बनाया गया था, ताकि हमारी अपनी सुरक्षा और समृद्धि को आगे बढ़ाया जा सके. जब सहयोगी देशों का अमेरिका पर भरोसा कम होने लगता है, तो वे सिर्फ़ यह इंतज़ार नहीं करते कि वॉशिंगटन अपनी नीति बदल देगा. वे ख़ुद को नई परिस्थितियों के मुताबिक़ ढालते हैं. वे नई साझेदारियां बनाते हैं. वे नेतृत्व के लिए दूसरे विकल्प तलाशते हैं. और एक बार जब ऐसे फ़ैसले ले लिए जाते हैं, तो उन्हें पलटना आसान नहीं होता.''

ब्लिंकन ने लिखा है, ''हमारे प्रतिद्वंद्वी और प्रतिस्पर्धी इसे अच्छी तरह समझते हैं. रूस लंबे समय से ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन को कमज़ोर करने की कोशिश करता रहा है. जब भी लोकतांत्रिक देश एकजुट होकर कार्रवाई करने में कम सक्षम होते हैं, तो उसका फ़ायदा चीन को मिलता है. अमेरिका की विश्वसनीयता पर उठने वाला हर सवाल उन ताक़तों के लिए एक अवसर बन जाता है, जो एक कमज़ोर और ज़्यादा बँटे हुए पश्चिम को देखना चाहती हैं.''

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इमेज कैप्शन, 19 नवंबर 2025 को अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी स्थित कैनेडी सेंटर में आयोजित अमेरिका-सऊदी इन्वेस्टमेंट फोरम के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान

सऊदी अरब की नज़र में ईरान युद्ध

सेंटर फोर स्ट्रैटिजिक इंटरनेशनल स्टडीज की रिपोर्ट में सऊदी अरब में अमेरिका के राजदूत रहे माइकल रैटनी ने तर्क दिया है कि ईरान के साथ युद्ध को लेकर सऊदी अरब का रुख़ गहरे द्वंद्व से भरा है. वह ईरान से नाराज़ भी है और बेहद सतर्क भी.

सऊदी सोच का सबसे स्पष्ट संकेत 9 मार्च को विदेश मंत्रालय के बयान में मिलता है, जिसे नाराज़ लेकिन संतुलित बताया गया. इसमें सऊदी और जीसीसी देशों पर ईरानी हमलों की निंदा की गई, अपनी सुरक्षा के लिए हर ज़रूरी क़दम उठाने के अधिकार की बात कही गई और चेतावनी दी गई कि अगर ईरानी हमले जारी रहे तो इसका दोनों देशों के संबंधों पर गंभीर असर पड़ेगा. हालांकि बयान में ईरान पर सीधे सैन्य कार्रवाई की स्पष्ट धमकी नहीं दी गई.

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माइकल रैटनी ने लिखा है, ''सऊदी अरब को भरोसा नहीं है कि अमेरिका, जिसने खाड़ी देशों से सलाह किए बिना युद्ध शुरू किया, अगर वह सीधे युद्ध में उतरता है तो उसकी पूरी सुरक्षा करेगा. उसे यह भी डर है कि अमेरिका किसी समय मिशन पूरा हुआ, घोषित करके पीछे हट जाएगा और बाद के नतीजों से अकेले सऊदी को निपटना पड़ेगा.''

''सऊदी अरब निश्चित रूप से ऐसा ईरान देखना चाहेगा जिसकी प्रॉक्सी ताक़त कमज़ोर हो चुकी हो और जिसकी मिसाइल के साथ परमाणु क्षमताओं को नुक़सान पहुंचा हो. लेकिन उसे भरोसा नहीं कि यह युद्ध ईरान की चुनौती का स्थायी समाधान कर देगा. उसे इस बात का भी डर है कि अगर ईरान अराजकता में डूब गया, तो शरणार्थी संकट और कट्टरपंथ जैसी नई समस्याएं पैदा हो सकती हैं.''

सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटिजिक इंटरनेशनल स्टडीज की रिपोर्ट इस धारणा को ख़ारिज करती है कि इस युद्ध से सऊदी अरब अमेरिका से दूर हो जाएगा. सऊदी सेना की संरचना, हथियार, प्रशिक्षण और सैन्य सहयोग दशकों से अमेरिका पर निर्भर हैं. चीन या पाकिस्तान इस व्यवस्था की जगह आसानी से नहीं ले सकते.

माइकल रैटिनी का तर्क है, ''सऊदी अरब अराजकता की तुलना में स्थिरता को प्राथमिकता देता है. वह ईरान से इतना नाराज़ ज़रूर है कि उसकी कमज़ोरी को अपने हित में देखता है, लेकिन आर्थिक और सैन्य जोखिमों के साथ अमेरिकी सुरक्षा गारंटी को लेकर अनिश्चितता के कारण वह सीधे युद्ध में शामिल होने का जोखिम नहीं उठाना चाहता. अमेरिका के आगे बढ़ जाने के बाद भी सऊदी अरब को एक कमज़ोर लेकिन अविश्वसनीय ईरान के साथ संबंध संभालकर ही चलने होंगे.''

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इमेज कैप्शन, अमेरिका, जीसीसी के छह देशों को ईरानी हमलों से सुरक्षा देने में नाकाम रहा है

सऊदी की दुविधा

सऊदी अरब के आधिकारिक बयान लगातार लोगों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश करते रहे हैं कि देश ईरानी हमलों को रोकने में सक्षम है. सऊदी का रक्षा मंत्रालय भी युद्ध के पहले दिन से लगभग हर दिन यह जानकारी देता रहा है कि आने वाले ड्रोन और मिसाइलों को मार गिराया गया.

हालांकि रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, तीन मार्च से पाँच अप्रैल 2026 के बीच उसने लगभग 900 हवाई ख़तरों को इंटरसेप्ट किया.

इसके बावजूद ईरान और इराक़ समर्थित गुटों के हमलों में रास तनूरा स्थित अरामको रिफाइनरी को नुक़सान पहुंचा, यनबू की रिफाइनरी पर हमला हुआ और प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर अमेरिकी वायुसेना के कई विमान क्षतिग्रस्त या नष्ट हो गए. इनमें एक बोइंग ई-3 सेंट्री और कम से कम एक केसी-135 स्ट्रैटोटैंकर विमान शामिल था.

इन घटनाओं ने अमेरिका के साथ दशकों पुरानी सुरक्षा साझेदारी की उपयोगिता को लेकर सऊदी अरब की चिंता बढ़ा दी है. ईरान के ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों के बड़े हमले कई बार अमेरिका के नेतृत्व वाले एयर डिफेंस सिस्टम को भेदने में सफल रहे हैं.

अमेरिका

इस युद्ध का सबसे बड़ा असर यह दिख रहा रहा है कि सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा साझेदारियों में विविधता लाने की पहले से जारी नीति को और तेज़ कर दिया है. सुरक्षा साझेदारियों में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव पाकिस्तान के साथ देखने को मिला है.

11 अप्रैल 2026 को सऊदी रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की कि पाकिस्तानी सैन्य बल धहरान स्थित किंग अब्दुलअज़ीज़ एयर बेस पर पहुंच गए हैं. यह सितंबर 2025 में हुए सऊदी-पाकिस्तान डिफेंस पैक्ट के तहत पहली औपचारिक तैनाती थी. रिपोर्टों के मुताबिक, इस तैनाती में क़रीब 13 हज़ार पाकिस्तानी सैनिक और पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमान शामिल हैं. 1991 के खाड़ी युद्ध के बाद यह सऊदी अरब में पाकिस्तान की सबसे बड़ी सैन्य तैनाती मानी जा रही है.

इसी दौरान यूक्रेन भी एक तकनीकी रक्षा साझेदार के रूप में उभरा है. 27 मार्च 2026 को जेद्दा में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ 10 वर्षीय रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए.

चीन

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इमेज कैप्शन, हाल के वर्षों में सऊदी अरब की चीन से भी रक्षा साझेदारी बढ़ी है

बढ़ते ग़ैर अमेरिकी सुरक्षा साझेदार

यह समझौता ख़ास तौर पर ईरान की ओर से विकसित शाहेद-136 ड्रोन का मुक़ाबला करने में यूक्रेन के अनुभव पर आधारित है. रूस 2022 से यूक्रेन के शहरों पर इन ड्रोन का व्यापक इस्तेमाल करता रहा है. रिपोर्टों के अनुसार, यूक्रेन ने अपनी कथित "ड्रोन डील" के तहत 200 से अधिक एंटी-ड्रोन विशेषज्ञ सऊदी अरब, क़तर और संयुक्त अरब अमीरात भेजे हैं.

इसके अलावा, ग्रीस की सैन्य मौजूदगी भी इस युद्ध के दौरान सक्रिय रूप से सामने आई. 2021 के द्विपक्षीय समझौते के तहत ग्रीक सैन्य बल हूती हमलों से अरामको के बुनियादी ढांचे की सुरक्षा के लिए पहले से सऊदी अरब में तैनात थे. 19 मार्च 2026 को यनबू में तैनात ग्रीस की ओर से संचालित पैट्रियट PAC-3 बैटरी ने समरेफ़ रिफ़ाइनरी की ओर दागी गई ईरान की दो बैलिस्टिक मिसाइलों को मार गिराया. मिशन शुरू होने के बाद यह सऊदी अरब में ग्रीक सेना की पहली घोषित सैन्य कार्रवाई थी.

रॉस अमेरिका-सऊदी संबंधों को उस दौर की अमेरिकी विदेश नीति की सबसे "जटिल और विभाजनकारी" चुनौतियों में से एक बताते हैं. उनके मुताबिक, अमेरिका के रणनीतिक हित सऊदी अरब के साथ करीबी संबंध बनाए रखने की ओर इशारा करते हैं, जबकि अमेरिकी लोकतांत्रिक मूल्य इसके विपरीत दिशा में उसे धकेलते हैं.

डोनाल्ड ट्रंप के लिए सऊदी अरब के साथ संबंध मुख्य रूप से हथियारों की बिक्री और तेल के आईने में देखे जाते हैं.

ट्रंप के दोनों कार्यकालों में सऊदी अरब उनकी पहली बड़ी विदेश यात्रा का ठिकाना रहा है. वहीं, जेराड कुशनर को आज भी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के क़रीबी के रूप में देखा जाता है.

इसके बावजूद, युद्ध के दौरान ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का मज़ाक उड़ाया. मार्च में ट्रंप ने कहा कि प्रिंस ने उन्हें और उनके प्रशासन को कम आंका था.

मियामी में सऊदी अरब की ओर से आयोजित एक निवेश सम्मेलन में ट्रंप ने कहा, "उन्हें नहीं लगा था कि आख़िरकार मेरी ख़ुशामद करनी पड़ेगी."

जून के आख़िरी सप्ताह में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने खाड़ी देशों का दौरा किया, लेकिन वह सऊदी अरब नहीं गए. उन्होंने बहरीन, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात का दौरा किया, जिसे सऊदी अरब का क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी माना जाता है.

बहरीन में खाड़ी के अरब देशों के राजनयिकों ने रुबियो से मुलाक़ात कर क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर अपनी चिंताएं साझा कीं. इस दौरान सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फ़ैसल बिन फ़रहान ने भी रुबियो से अलग से मुलाक़ात की.

अमेरिका के पूर्व राजदूत माइकल रैटनी ने कहा है, "जिस पल ईरान ने होर्मुज़ बंद किया, उसी पल पूरे खाड़ी क्षेत्र की सोच बदल गई. अब ईरान के पास ऐसा दबाव बनाने का साधन है, जिसे वह खाड़ी और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर किसी भी समय इस्तेमाल कर सकता है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.