ईरान का नया नेतृत्व, पुराने शासन से काफ़ी अलग क्यों है

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- Author, पॉल एडम्स
- पदनाम, कूटनीतिक संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 15 मिनट
जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले महीने वर्साय पैलेस में डिनर के दौरान ईरान के साथ युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर किए, तो कई लोगों ने इसमें एक विडंबना देखी.
उनके मेजबान यानी फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, शायद यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि ट्रंप के अपना मन बदलने से पहले ही समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर हो जाएं.
संभव है कि उन्होंने यह भी सोचा हो कि सोने की सजावट वाले 'हॉल ऑफ मिरर्स' का भव्य माहौल उनके मेहमान को पसंद आएगा.
लेकिन समझौते पर हस्ताक्षर के लिए इस जगह को चुनना, निश्चित रूप से इस डेढ़ पन्ने के समझौते की तुलना 1919 में पहले विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद हुई बेहद लंबी वर्साय की संधि से कराता है.
सन 1919 की इस संधि ने यूरोप की तस्वीर बदल दी थी, लेकिन भारी युद्ध क्षतिपूर्ति की शर्तों ने जर्मनी में गहरा गुस्सा और कटुता पैदा कर दी. इसलिए 'वर्साय की संधि' 20 साल बाद शुरू हुए एक और विश्व युद्ध की वजहों में से एक बनी.
क्या ईरान के साथ हुआ यह समझौता, जो कई मायनों में अलग है, उसे भविष्य में उतना ही निर्णायक साबित होने वाला माना जाएगा?
क़रीब तीन सप्ताह बाद भी दोनों पॉक्षों के बीच नाज़ुक युद्धविराम कमोबेश कायम है.
लेकिन होर्मुज़ स्ट्रेट और उसके आसपास कई झड़पों के बाद, और युद्ध के पीछे की वजहों में से किसी के समाधान का फ़िलहाल कोई संकेत नहीं होने से मध्य पूर्व की स्थिति पहले की तरह ही बेहद अस्थिर दिखाई देती है.

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इस बीच, ईरान बड़े बदलाव के दौर से गुज़र रहा है.
देश अपने पूर्व सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई को विदाई दे रहा है, जिनकी चार महीने पहले अमेरिका और इसराइल के हवाई हमलों में मौत हो गई थी. इन्हीं हमलों के बाद युद्ध की शुरुआत हुई थी और ईरान में शासन के बड़े हिस्से का नेतृत्व ख़त्म हो गया था.
यह एक बड़ा मौक़ा है. यह इस बात की बड़ी याद दिलाता है कि पुरानी पीढ़ी की जगह अब नई पीढ़ी ने ले ली है. और नए चेहरों के साथ एक नया नज़रिया भी आया है, जिसके अपने अलग असर हो सकते हैं.
अमेरिका और इसराइल ने भले ही देश के कई पुराने नेताओं को मार डाला हो लेकिन क्या उनकी जगह अब पहले से भी ज़्यादा बड़े विरोधियों ने ले ली है?
फिर से सजती शतरंज की बिसात

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जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज़ में अंतरराष्ट्रीय मामलों और मध्य पूर्व अध्ययन के प्रोफेसर वाली नसर ने मुझसे कहा, "यह युद्ध अब तक जितना हमने समझा है, उससे कहीं अधिक बड़ा और दूरगामी असर वाला है."
"इस स्तर के बड़े युद्ध अंत में पूरी शतरंज की बिसात को बदल देते हैं. मध्य पूर्व में भी यही होने वाला है."
जनवरी में ईरान व्यापक जन विरोध प्रदर्शनों से जूझ रहा था. उस समय ट्रंप और इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू दोनों ने अनुमान जताया था कि इससे ईरान में इस्लामिक गणराज्य के पतन की शुरुआत हो सकती है.
दशकों से लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था पहले ही बुरी तरह कमजोर हो चुकी थी. इसके अलावा, छह महीने पहले अमेरिका और इसराइल के साथ हुए 12 दिन के युद्ध के घाव भी अभी तक पूरी तरह नहीं भरे थे.
ईरान का परमाणु कार्यक्रम, जो लंबे समय से कूटनीतिक दबाव बनाने का एक अहम कारण रहा था, वह ट्रंप के दावे के मुताबिक़ पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ था, लेकिन उसे बड़ा नुक़सान जरूर पहुंचा था.
उसके यूरेनियम भंडार का ठिकाना निश्चित रूप से पता नहीं था, जिसके बारे में माना जाता था कि उसे और समृद्ध करने पर उससे 10 या 11 परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं. हालांकि माना जाता था कि उसका बड़ा हिस्सा इस्फहान परमाणु परिसर के पास मलबे के नीचे दबा हुआ है.
क्षेत्र के दूसरे हिस्सों में भी ईरान का 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस', लगातार बड़े झटकों का सामना कर चुका था, जो मध्य पूर्व में उसके सहयोगी संगठनों और साझेदारों का एक कमज़ोर गठबंधन है.
सीरिया में ईरान के क़रीबी सहयोगी बशर अल-असद की सरकार ख़त्म हो चुकी थी. साल 2024 के अंत में कुछ ही हफ़्तों के भीतर उस सरकार का पतन हो गया.

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इसराइल ने लेबनान में ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह के कई शीर्ष नेताओं की हत्या कर दी थी. साथ ही, पेजर में विस्फोट और वॉकी-टॉकी हमलों के जरिए उसके लड़ाकों की बड़ी संख्या को ख़त्म कर दिया था.
ग़ज़ा पट्टी में ईरान का एक और सहयोगी हमास भी इसी तरह की स्थिति का शिकार हुआ. अक्तूबर 2023 में हमास के हमलों के जवाब में इसराइल ने लगातार सैन्य अभियान चलाया, जिससे ग़ज़ा का बड़ा हिस्सा तबाह हो गया और हज़ारों नागरिकों की मौत हुई.
इसके बाद ग़ज़ा युद्ध के जवाब में यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने इसराइल पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं और रेड सी में जहाज़ों को निशाना बनाना शुरू कर दिया.इसके जवाब में इसराइल, अमेरिका और ब्रिटेन ने कई जवाबी हमले किए, जिनमें से कुछ में हूती नेतृत्व को भी निशाना बनाया गया.
देश के भीतर और बाहर इतने झटकों के बाद आम राय यही थी कि ईरान बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच चुका है. अंग्रेज़ी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ट्रंप को कई ख़ुफ़िया रिपोर्ट मिली थीं, जिनमें कहा गया था कि 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान कभी इतना कमजोर नहीं रहा.
ऐसे में यह कल्पना करना भी मुश्किल माना जा रहा था कि अमेरिका और इसराइल के ख़िलाफ़ लड़ाई को ईरान बराबरी की स्थिति तक पहुंचा सकता है.
लेकिन हुआ यह कि इस्लामिक गणराज्य (ईरान) अब भी कायम है. इसकी एक बड़ी वजह यह रही कि वह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद करने और वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता रखता है.
क्या अब बढ़त तेहरान के पास है?

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ट्रंप अक्सर कहते हैं कि उन्होंने ईरान में शासन परिवर्तन कर दिया है. हालाँकि वाली नसर इससे असहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि इसका फ़ायदा आख़िरकार ईरान को ही मिला.
उन्होंने कहा, "पूरी तरह नई पीढ़ी ने सत्ता संभाल ली है. उनके पास स्पष्ट एजेंडा है. उन्होंने युद्ध का प्रबंधन किया और अब शांति का नेतृत्व भी वही करेंगे."
नसर के मुताबिक़, नया नेतृत्व उन लोगों का नहीं है जिन्हें अमेरिका अक्सर "कट्टर विचारधारा से प्रेरित अव्यावहारिक लोग" कहता रहा है.
इसके बजाय यह क्रांति के बाद उभरी ऐसी पीढ़ी है, जिसका पूरा ध्यान देश को बचाए रखने पर है और जो अपने पूराने नेताओं की तुलना में कहीं अधिक निर्णायक तरीके से फ़ैसले लेने को तैयार है.
56 वर्षीय नए सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई अपने पिता अली ख़ामेनेई से क़रीब 30 साल छोटे हैं.
युद्ध की शुरुआत में मारे जाने से पहले अली ख़ामेनेई के बारे में माना जाता था कि उनकी शारीरिक स्थिति काफ़ी कमजोर हो चुकी थी.
राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान की उम्र 71 साल है, लेकिन 1979 की क्रांति का नेतृत्व करने वाली पीढ़ी अब पूरी तरह सत्ता से बाहर हो चुकी है.
संसद के अध्यक्ष और अमेरिका के साथ बातचीत के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद ग़बर ग़ालिबाफ, और रिवोल्यूशनरी गार्ड के प्रमुख अहमद वहीदी, दोनों की उम्र 60 साल से अधिक है.
नए सर्वोच्च नेता की तरह इन दोनों के भी ईरान की बेहद प्रभावशाली इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) से क़रीबी संबंध हैं.

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लंदन स्थित चैथम हाउस के मध्य पूर्व और उत्तर अफ़्रीका कार्यक्रम की निदेशक सनम वकील कहती हैं, "ये क्रांति की संतान हैं. अब ईरान की कमान 86 वर्षीय नेता के हाथ में नहीं है. व्यवस्था के विकास की सबसे बड़ी रुकावट अली ख़ामेनेई थे."
दशकों तक सतर्क रुख़ अपनाने वाले ख़ामेनेई ने ऐसी नीति अपनाई जिसे अक्सर "न युद्ध, न शांति" कहा जाता था. लेकिन उनके उत्तराधिकारी अधिक साहसी साबित हुए हैं.
उन्होंने पूरे क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए और कुछ ही हफ़्तों बाद ऐसे समझौते के लिए बातचीत की मेज़ पर भी बैठ गए, जिसकी शर्तें पहली नज़र में तेहरान के लिए अपमानजनक नहीं मानी जातीं.
नसर कहते हैं, "उन्होंने दिखा दिया है कि वे पिछली पीढ़ी की तुलना में कहीं अधिक आक्रामक तरीके से युद्ध लड़ने को तैयार हैं."
जब साल 2020 में ट्रंप ने रिवोल्यूशनरी गार्ड के पूर्व कमांडर कासिम सुलेमानी को मारने के लिए हवाई हमले का आदेश दिया था, तब ईरान ने जवाबी कार्रवाई से पहले जानबूझकर अपने इरादे का संकेत दिया था.
उसने इराक़ में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर 12 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं. हालाँकि उस हमले में किसी भी अमेरिकी सैनिक की मौत नहीं हुई.

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इस साल अमेरिका और इसराइल के पूर्ण सैन्य हमले का सामना करते हुए ईरान ने पहले की तरह कोई संयम नहीं दिखाया.
उसने पूरे क्षेत्र में मौजूद कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए, जिनमें बहरीन में स्थित अमेरिका के पांचवें बेड़े का मुख्यालय और क़तर का अल-उदीद एयरबेस भी शामिल था.
कुवैत में अमेरिका के छह सैनिक मारे गए. लड़ाई के दौरान सैकड़ों अन्य लोग घायल हुए.
ईरान का अमेरिका के खाड़ी क्षेत्र के सहयोगी देशों पर हमला करने, जहाज़ों को निशाना बनाने और वैश्विक व्यापार के लिए बेहद अहम समुद्री मार्ग होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद करने की तैयारी भी व्हाइट हाउस के लिए अप्रत्याशित साबित हुई.
दशकों से अमेरिका सैन्य ठिकानों के अपने व्यापक नेटवर्क और खाड़ी देशों के साथ लगातार मजबूत होते रिश्तों की मदद से ईरान को रोके रखने की पूरी कोशिश करता रहा था.
लेकिन इसराइल और अमेरिका के हमलों के जवाब में ईरान की तीखी प्रतिक्रिया ने संकेत दिया कि यह रणनीति अब पहले जैसी प्रभावी नहीं रह गई है.
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप में ईरान परियोजना के निदेशक अली वाएज़ कहते हैं, "इनमें से कई देश उम्मीद कर रहे थे कि उनकी ज़मीन पर मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने उन्हें सुरक्षा देंगे, न कि उन्हें निशाना बना देंगे."
उन्होंने कहा, "अब खाड़ी देश अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और प्रतिरोध की अपनी रणनीति, दोनों पर सवाल उठा रहे हैं."
रिपोर्टों के मुताबिक़, अधिकांश खाड़ी देश अब ईरान के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहे हैं और अपने इस चुनौतीपूर्ण पड़ोसी के साथ तनाव कम करने के रास्ते तलाश रहे हैं.

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समाचार एजेंसी एएफ़पी ने एक अज्ञात राजनयिक के हवाले से यह भी बताया कि सऊदी अरब, जिसने 2023 में दशकों की दुश्मनी के बाद ईरान के साथ संबंध बहाल किए थे, अब 'सुलह' के लिए एक शिखर सम्मेलन आयोजित करने की तैयारी कर रहा है.
इस सम्मेलन में ईरान और खाड़ी क्षेत्र के अन्य देशों को एक साथ लाने की योजना है.
हालांकि अली वाएज़ मानते हैं कि ये देश जो युद्ध नहीं चाहते थे और जिससे बचने की उन्होंने पूरी कोशिश की, उसमें फंसने को लेकर अपनी नाराज़गी के बावजूद कोई भी देश अमेरिकी सेना के साथ अपने सैन्य संबंध पूरी तरह तोड़ने के लिए तैयार है.
उन्होंने कहा, "वे सुरक्षा व्यवस्था के मामले में अमेरिका पर बहुत अधिक निर्भर हैं, इसलिए उससे पूरी तरह संबंध तोड़ना उनके लिए संभव नहीं है. वे संतुलन बनाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन आख़िर में उनके पास इससे बेहतर कोई विकल्प नहीं है."
बड़े ऐतिहासिक उदाहरणों से तुलना करने के बजाय अली वाएज़ मौजूदा स्थिति को एक "लचीला दौर" बताते हैं, जिसमें पुरानी दुश्मनियां नए रिश्तों में बदलने की संभावना मौजूद है.
उन्होंने कहा, "मुझे यथार्थवादी सोच का ऐसा स्तर दिखाई दे रहा है, जो पहले मौजूद नहीं था."
लेकिन इन सब के बीच ईरान के लोगों का क्या?
नए व्यवहारवादी नेता

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जनवरी में ट्रंप ने ईरान के नागरिकों से कहा था कि उनके लिए "मदद रास्ते में है."
28 फ़रवरी को युद्ध शुरू करते समय उन्होंने और भी स्पष्ट शब्दों में कहा, "जब हमारा काम पूरा हो जाए, तो आप लोग अपनी सरकार की कमान संभाल लें. वह आपकी सरकार होगी."
अब तक ये वादे केवल भ्रम साबित हुए हैं. ईरान में भले ही नई पीढ़ी सत्ता में आ गई हो, लेकिन उसने अभी तक लोगों को अधिक आज़ादी या बेहतर आर्थिक भविष्य की कोई स्पष्ट उम्मीद नहीं दी है.
चैथम हाउस की अबू धाबी स्थित विश्लेषक अनीसेह बसीरी तबरीज़ी का मानना है कि अपनी सत्ता बचाने पर पूरी तरह से केंद्रित ईरानी शासन, विरोध की आवाज़ों को लेकर अलग रुख़ अपनाता नहीं दिखेगा.
वह कहती हैं, "वे सड़कों पर होने वाली गतिविधियों पर बहुत ही कड़ी नजर बनाए रखेंगे."
हालांकि, युद्ध से पहले ही सरकारी संस्थानों के बाहर हिजाब पहनना अनिवार्य नहीं रह गया था और ईरान के कई रेस्तरां में चुपचाप शराब भी उपलब्ध होने लगी थी.
इससे ऐसे संकेत मिलते हैं कि शासन धीरे-धीरे कुछ पुराने सामाजिक प्रतिबंधों को ढीला कर रहा है.
वाली नसर का कहना है कि यह सब मजबूरी में लिया गया फ़ैसला है. उनका कहना है कि देश में लोगों का भरोसा फिर से कायम करना इसकी सबसे बड़ी जरूरत है.
उन्होंने कहा, "उन्होंने व्यावहारिक फ़ैसला लिया कि राज्य के हित में इन पाबंदियों को कुछ हद तक ढीला करना जरूरी है."
जनवरी में बड़े पैमाने पर हुई हिंसा से पैदा हुए झटके के बाद शासन ने कम से कम यह दिखा दिया कि वह देश की संप्रभुता की रक्षा कर सकता है.

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ईरान के लोगों के लिए यह युद्ध बेहद उलझन भरा रहा है. शासन की कठोरता को लेकर उनका डर, धीरे-धीरे एक अलग तरह के डर में बदल गया, जब अमेरिका और इसराइल के बम उनके देश पर गिरने लगे.
इन हमलों में आम नागरिक मारे गए और जरूरी बुनियादी ढांचे को नुक़सान पहुंचा.
युद्ध के पहले दिन मीनाब के एक प्राइमरी स्कूल में बड़ी संख्या में बच्चों की मौत के बाद कुछ लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि असली दुश्मन आख़िर है कौन.
उन्हें आज़ादी दिलाने का दावा करने वाले इसराइल और अमेरिका ही देश को तबाह करने पर आमादा दिखाई देने लगे.
लेकिन अमेरिका और इसराइल की संयुक्त सैन्य ताक़त का सामना करने के बाद क्या ईरान का नया नेतृत्व इस सीमित अवसर का इस्तेमाल कर शासन की कमजोर पड़ चुकी वैधता को फिर से मजबूत कर पाएगा?
अली वाएज़ कहते हैं, "यह कुछ हद तक माओ के बाद वाले चीन जैसा दौर है. पूरे शासन तंत्र को एहसास हो गया है कि अब कुछ बदलना ही होगा. नया नेतृत्व समझता है कि उसे लोगों के साथ एक नया सामाजिक समझौता करना होगा."
वे ऐसा कर पाएंगे या नहीं, यह अभी भी बड़ा सवाल है. ईरान की सत्ता अब पहले से कहीं अधिक आईआरजीसी के शीर्ष नेतृत्व के हाथों में है.
जनवरी में हुए खूनी दमन में अब भी अपने हज़ारों दोस्तों की मौत का दुख झेल रहे युवाओं की बड़ी संख्या मानती है कि देश के भविष्य को तय करने में उनकी कोई वास्तविक भूमिका नहीं है.
ईरान इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. देश घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुराने विश्वासों और भविष्य की नई संभावनाओं के बीच बेहद नाजुक संतुलन की स्थिति में है.
हाल के समय में खाड़ी क्षेत्र में कई बार तनाव बढ़ने के बावजूद ईरान ने अमेरिका के साथ कूटनीतिक प्रक्रिया शुरू कर दी है.
इसका नतीजा ऐसा हो सकता है जिसे अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पहले ही "रिश्तों में बुनियादी बदलाव" बता चुके हैं.

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यदि परमाणु कार्यक्रम में रियायतों के बदले प्रतिबंधों में राहत मिलती है, तो शासन के सामने अर्थव्यवस्था को संभालने का एक बड़ा अवसर होगा.
इससे देश के भीतर उसकी कमजोर पड़ चुकी साख को फिर से मजबूत करने में मदद मिल सकती है.
समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर होने के बाद ईरान को पहले ही अमेरिकी प्रतिबंधों में कुछ छूट मिल चुकी है, जिसके तहत उसे 60 दिनों तक कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात की अनुमति दी गई है.
60 दिन की बातचीत की अवधि के दौरान राहत के और भी कदम उठाए जा सकते हैं. इनमें ईरान की अरबों डॉलर की फ़्रीज़ हुई संपत्तियों को जारी करना शामिल हो सकता है.
वहीं, अंतिम समझौता होने पर सबसे बड़ी राहत के तौर पर उस पर लगे सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटाए जा सकते हैं.
समझौता ज्ञापन में ईरान के लिए 300 अरब डॉलर की "पुनर्निर्माण और विकास" योजना का भी ज़िक्र है, हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इसके लिए धन कौन उपलब्ध कराएगा.
इन सभी आर्थिक प्रोत्साहनों को साथ मिलाकर देखें, तो वे ईरान के नए नेतृत्व के लिए समझौता करने की मजबूत वजह बन सकते हैं.
सनम वकील भी मानती हैं कि इस समय क्षेत्र के सामने "एक अवसर की खिड़की" खुली हुई है, लेकिन वह इसे लेकर सतर्क हैं.
उन्होंने कहा, "ऐसी भी स्थिति बन सकती है कि कोई समझौता न हो, बातचीत लगातार लंबी खिंचती रहे और राष्ट्रपति ट्रंप धैर्य खो दें. फिर वे कह सकते हैं, 'ठीक है, अब तीसरे दौर का समय आ गया' है."
जिन विशेषज्ञों से मैंने बात की, उनमें से कोई भी यह नहीं मानता कि भविष्य पूरी तरह सुरक्षित या तय है.
ईरान, उसके मध्य पूर्व के पड़ोसी देशों और अमेरिका के बीच दशकों से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंध अविश्वास की गहरी विरासत छोड़ गए हैं. इन रिश्तों की पहचान आपसी संदेह और लगभग पूरी तरह ख़त्म हो चुके भरोसे से होती है.
इसमें विफलता की आशंकाओं की भी कोई कमी नहीं है. ईरान के परमाणु कार्यक्रम, होर्मुज़ स्ट्रेट के भविष्य, लेबनान में चल रहे संघर्ष और सभी पक्षों के कट्टरपंथी समूहों के स्थापित रुख़ जैसे कई मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं.
छह उथल-पुथल भरे महीनों के बाद मध्य पूर्व का स्वरूप बदलता हुआ जरूर दिखाई देने लगा है. लेकिन इस बदलाव के दौर को वास्तव में बेहतर भविष्य में बदलने के लिए अभी सही दिशा में बहुत कुछ होना बाक़ी है.
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