बांकीपुर उप चुनाव: प्रशांत किशोर की बीजेपी को उसके गढ़ में चुनौती देने के पीछे क्या रणनीति है

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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बिहार में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर बांकीपुर विधानसभा सीट से उप चुनाव लड़ने वाले हैं. रविवार को पार्टी की कोर कमेटी की बैठक में यह फ़ैसला लिया गया है.
बिहार में पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में बांकीपुर सीट से बीजेपी के नितिन नबीन जीते थे. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नबीन ने यह सीट छोड़ दी थी.
चुनाव आयोग ने बताया है कि मध्य प्रदेश की दतिया और गुजरात की मांजलपुर विधानसभा सीट के साथ ही बांकीपुर सीट पर 30 जुलाई को वोट डाले जाएंगे और वोटों की गिनती 3 अगस्त को होगी.
प्रशांत किशोर का विधानसभा उप चुनाव लड़ने का फ़ैसला कई मायनों में हैरान करने वाला भी है, क्योंकि बांकीपुर सीट को बीजेपी का गढ़ भी माना जाता है और राज्य में उसके नेतृत्व में सरकार भी चल रही है.
ऐसे में प्रशांत किशोर कितनी बड़ी चुनौती पेश कर पाएंगे, यह देखना भी दिलचस्प होगा.
इससे पहले, बिहार विधानसभा चुनाव-2025 के दौरान उन्होंने अंतिम समय में ख़ुद चुनाव लड़ने से मना कर दिया था. उन्होंने कहा था कि 'यह उनकी पार्टी का फ़ैसला था कि राज्य की अन्य सीटों पर ध्यान देना ज़रूरी है.'
इसके बाद भी विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी का खाता नहीं खुला था.

बांकीपुर सीट की एक ख़ास बात पर गौर करें तो 2025 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर कुल दस उम्मीदवार खड़े हुए थे और इनमें से सभी सामान्य (जनरल) वर्ग के थे.
यह इस बात की तरफ भी इशारा है कि इस सीट पर किस वर्ग के वोटरों का वर्चस्व है.
बांकीपुर सीट से विधानसभा उप चुनाव लड़ने के पीछे प्रशांत किशोर की क्या रणनीति हो सकती है, यह सवाल कई लोगों के मन में उत्सुकता पैदा कर सकता है.
क्या बिहार की सियासत से नीतीश कुमार की विदाई और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रशांत किशोर कोई नया सियासी समीकरण तलाशने की कोशिश में हैं.
प्रशांत किशोर ने बांकीपुर के लोगों से कहा, "मोदी जी तो आपसे बात करने आएंगे नहीं. आज भी नहीं आएंगे, पांच बरस बाद भी नहीं आएंगे. कैसे मोदी जी को पता चलेगा कि सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने से आप ख़ुश नहीं हैं. भाजपा को बांकीपुर से हराइए. उन तक अपने आप ख़बर पहुंच जाएगी कि उन्होंने जिस व्यक्ति का चुनाव किया है, उससे आप सहमत नहीं हैं."
'पीके के पास हारने के लिए कुछ नहीं'

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वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं कि प्रशांत किशोर के पास चुनाव में हारने के लिए कुछ भी नहीं है, लेकिन यह सीट उन्हें हेडलाइन्स में जगह दिला सकती है.
वह कहते हैं, "ऐसा लगता है कि प्रशांत किशोर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं. वो ऐसी सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, जो बीजेपी का मज़बूत गढ़ रही है. यहां से चुनाव लड़ते ही वो चर्चा में आ जाएंगे."
इस क्षेत्र से नितिन नबीन पांच बार चुनाव जीत चुके हैं, इससे पहले उनके पिताजी यहां से विधायक होते थे. पहले यह इलाक़ा पटना पश्चिम विधानसभा सीट के अंतर्गत आता था.
नितिन नबीन ने साल 2006 में पहली बार इस सीट से चुनाव जीता था. उसके बाद बांकीपुर सीट बनने पर साल 2010 से नितिन नबीन ही लगातार यहां से बीजेपी के विधायक रहे.
बांकीपुर विधानसभा सीट पटना के शहरी क्षेत्र में आती है.
नचिकेता नारायण कहते हैं, "पीके जीत गए तो उनके लिए बहुत बड़ी बात होगी और कभी-कभी लोगों को लगता है कि वो हारकर भी सुर्खियाँ बटोर लेंगे, जैसे कि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल बनारस से नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ लड़े थे."
"बांकीपुर सीट अब हाई-प्रोफ़ाइल सीट बन गई है और यहां बीजेपी जो भी उम्मीदवार उतारेगी वह इलाक़े के लिए नया नाम होगा, जबकि पीके को लगता है कि उन्हें जनता कम-से-कम जानती तो है ही."
नचिकेता नारायण ने कहा, "प्रशांत किशोर के मन में अपना गणित चल रहा होगा. वो मौक़े की तलाश में हैं कि अगड़ी जाति के बीजेपी समर्थक सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने या भोजपुर और कुछ अन्य घटनाओं की वजह से नाराज़ हैं. ऐसे में पीके को लगता है कि वोटर उन्हें वोट देकर बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से अपनी नाराज़गी जता सकते हैं."
बिहार में भोजपुर ज़िले के भरत भूषण तिवारी के 'एनकाउंटर' का मामला पिछले कुछ दिनों से लगातार सुर्ख़ियों में है. 7 जून को पुलिस ने भरत तिवारी का 'एनकाउंटर' किया, जिसके बाद इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई थी.
बीते कुछ समय में बिहार में हुई कई घटनाओं को लेकर प्रशांत किशोर काफ़ी सक्रिय भी दिखे हैं.
बीजेपी की परीक्षा

बांकीपुर विधानसभा सीट लंबे समय से काफ़ी कम वोटिंग के लिए जानी जाती रही है. पिछले साल हुए चुनाव में भी इस सीट पर क़रीब 41% वोट डाले गए थे.
यानी वोटरों के बीच जिस 'अर्बन अपैथी' (शहरी उदासीनता) की बात की जाती है, वह बांकीपुर के वोटर टर्न आउट में दिखती है.
बीजेपी को साल 2025 में यहां क़रीब 25% वोट मिले थे और नितिन नबीन ने क़रीब 52 हज़ार वोटों से जीत दर्ज की थी.
यानी बीजेपी को इस सीट पर क़रीब 75% वोटरों ने वोट नहीं दिया. ज़ाहिर है प्रशांत किशोर इस गणित में अपने लिए संभावना की तलाश ज़रूर करेंगे, जो बीजेपी के सामने एक चुनौती हो सकती है.
बीजेपी के लिए यहां एक अन्य चुनौती यह भी हो सकती है कि जो उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट रही है, उस पर न केवल वह जीत हासिल करे, बल्कि जीत के अंतर को भी बचा कर रखे.
वरिष्ठ पत्रकार माधुरी कुमार कहती हैं, "मैं समझती हूं कि प्रशांत किशोर को लगता है कि कम से कम उनके ख़ुद के मुक़ाबले बीजेपी के पास इस सीट पर कोई जाना-पहचाना चेहरा नहीं है, तो वो इस स्थिति का फ़ायदा उठा सकते हैं."
वह कहती हैं, "प्रशांत किशोर किसी भी तरह बिहार की सियासत में एक एंट्री चाहते हैं. साल 2025 के विधानसभा चुनावों में उन्हें फ़ीडबैक मिल गया था कि वो हार जाएंगे, इसलिए उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा. संभव है इस बार उन्हें कोई फ़ीडबैक मिला हो कि उनके पास बीजेपी और आरजेडी के उम्मीदवारों के मुक़ाबले बढ़त है."
हालांकि साल 2025 के चुनाव नतीजों पर गौर करें तो इस सीट पर जन सुराज पार्टी की वंदना कुमारी भले ही तीसरे नंबर पर थीं, लेकिन उन्हें 5% से भी कम वोट मिले थे.
जन सुराज का चुनावी प्रदर्शन

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प्रशांत किशोर ने राजनीति में एक चुनावी रणनीतिकार के तौर पर एंट्री की थी. वो अक्सर दावा करते हैं कि उन्होंने कई सियासी दलों को सत्ता दिलाने में अहम भूमिका निभाई.
उन्होंने बिहार में कई जगहों की यात्रा की और अपने साथ लोगों को जोड़ने की कोशिश भी की. फिर साल 2024 में उन्होंने अपनी जन सुराज पार्टी बनाई.
हालाँकि पहले उन्होंने ख़ुद संभावना जताई थी कि वो राघोपुर सीट से चुनाव लड़ सकते हैं. यह सीट आरजेडी की परंपरागत सीट रही है और साल 2025 में तेजस्वी यादव यहां से चुनाव लड़ रहे थे.
कई लोगों के मानना था कि चुनाव के ठीक पहले प्रशांत किशोर का चुनाव मैदान से पीछे हट जाना, पार्टी के बहुत बुरे प्रदर्शन के पीछे एक वजह थी.
उन चुनावों में बिहार की 243 विधानसभा सीटों में 89 पर सीटें बीजेपी के खाते में गईं, जबकि जेडीयू को 85 सीटें मिलीं. वहीं राष्ट्रीय जनता दल 25 और एलजेपी (आर) को 19 सीटों पर जीत मिली थी.
जन सुराज पार्टी चुनाव में अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी. पार्टी का प्रदर्शन इतना ख़राब रहा कि उसके 238 में से 236 उम्मीदवार अपनी ज़मानत तक नहीं बचा पाए.
उन चुनावों में प्रशांत किशोर की पार्टी को कुल क़रीब 3.4 फ़ीसदी वोट मिले थे और वे जिन दावों के साथ चुनाव मैदान में उतरे थे वो पूरी तरह धराशायी हो गए.
आमतौर पर उप चुनावों को लेकर वोटरों या राजनीतिक विश्लेषकों की बहुत ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखती है, लेकिन पीके ने उम्मीदवार बनने की घोषणा कर बांकीपुर सीट पर कई लोगों की नज़र टिका दी है.
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