दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर सख़्ती से जुड़े सवालों के सुप्रीम कोर्ट में दिए ये जवाब

सीजेपी प्रोटेस्ट के दौरान जो कार्रवाई दिल्ली पुलिस ने की उस पर सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी गई है.
इमेज कैप्शन, सीजेपी प्रोटेस्ट के दौरान जो कार्रवाई दिल्ली पुलिस ने की उस पर सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी गई है
    • Author, विनीत भल्ला
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

एसआईआर के विरोध में 10 अक्तूबर को दिल्ली में प्रदर्शन बुलाया गया था.

इससे पहले ही दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई. मोबाइल इंटरनेट बंद किया गया, बड़ी संख्या में ट्रेनें रद्द हुईं और दिल्ली मेट्रो के कई स्टेशनों पर आने-जाने के रास्ते बंद कर दिए गए.

बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों, नेताओं, वकीलों और पत्रकारों को अलग-अलग जगहों से हिरासत में भी लिया गया.

इन कार्रवाइयों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ताओं ने अवैध हिरासत, पुलिस की कथित ज़्यादती और अदालत के आदेश के बावजूद सार्वजनिक परिवहन पर पाबंदियां लगाने के आरोप लगाए. मगर इस कार्रवाई के पीछे पुलिस ने अपने तर्क सुप्रीम कोर्ट में दिए हैं.

पुलिस ने क्या कहा?

इस कार्रवाई के लिए दिल्ली पुलिस ने सीजेपी के 20 जुलाई और छह से आठ अक्तूबर के बीच हुए प्रदर्शनों को लेकर कई गंभीर दावे किए हैं.

पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन में गंभीर आपराधिक मामलों से जुड़े लोग शामिल हो गए थे और भीड़ के हमले में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी घायल हुए.

पुलिस ने हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों और नेताओं के साथ किए गए व्यवहार पर भी अपना पक्ष रखा है.

इसके अलावा केंद्रीय गृह सचिव, रेलवे और दिल्ली पुलिस ने इंटरनेट बंद करने, ट्रेनें रद्द करने और मेट्रो स्टेशन बंद रखने के कारण बताए हैं.

पुलिस ने क्या कहा?

ये तस्वीर जुलाई में दिल्ली में हुए सीजेपी के प्रोटेस्ट के दौरान की है
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1. पुलिसकर्मियों के साथ हिंसा?

दिल्ली पुलिस का दावा है कि सीजेपी के 20 जुलाई के प्रदर्शन में ऐसे लोग शामिल हो गए थे, जिनके ख़िलाफ़ दंगा, बलात्कार, हत्या और नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों का रिकॉर्ड था.

पुलिस के मुताबिक़, लगभग 30 हज़ार लोगों की भीड़ ने पुलिसकर्मियों पर हमला किया. उनके हेलमेट और सुरक्षा उपकरण उतार दिए गए और उन्हें पत्थर वाली सड़क पर घसीटा गया.

पुलिस ने इस घटना को भीड़ की हिंसा और लिंचिंग जैसी कार्रवाई बताया है.

दिल्ली पुलिस का दावा है कि इस दौरान 240 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए.

2. 'फ़्रीलांस पत्रकारिता की आड़' में आए लोगों पर पुलिस ने क्या आरोप लगाए?

दिल्ली पुलिस का दावा है कि छह से आठ अक्तूबर के बीच हुए प्रदर्शनों में कुछ लोगों ने 'फ़्रीलांस पत्रकारिता की आड़' में भीड़ को उकसाया.

पुलिस का आरोप है कि इन लोगों ने पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की और गाली-गलौज की.

पुलिस के मुताबिक़, इन घटनाओं में महिला पुलिसकर्मियों समेत एक दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए.

3. हिरासत में लिए गए राजनीतिक नेताओं के साथ कैसा व्यवहार किया गया?

दिल्ली पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन वाली जगहों से हटाए गए नेताओं को लॉक-अप में नहीं रखा गया.

पुलिस के मुताबिक़, उन्हें थाना प्रभारियों यानी एसएचओ के निजी कमरों में बैठाया गया.

पुलिस ने दावा किया कि नेताओं को "चाय, कॉफ़ी, खाना और दूसरी खाने-पीने की चीज़ें" दी गईं, ताकि उनके पद की गरिमा पूरी तरह बनी रहे.

दिल्ली पुलिस का दावा है कि आम प्रदर्शनकारियों को भी जेल में नहीं रखा गया.
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4. हिरासत में लिए गए आम प्रदर्शनकारियों को कहाँ रखा गया?

दिल्ली पुलिस का दावा है कि आम प्रदर्शनकारियों को भी जेल में नहीं रखा गया.

पुलिस के मुताबिक़, पाबंदी के आदेशों का उल्लंघन करने वाले लोगों को अस्थायी हिरासत केंद्रों में केवल दो से छह घंटे तक रखा गया.

पुलिस का कहना है कि हिरासत में लिए गए लोगों को "गर्म, ताज़ा और अच्छा खाना" दिया गया और फिर छोड़ दिया गया.

5. रायसीना हिल के आसपास मोबाइल इंटरनेट 24 घंटे के लिए क्यों बंद किया गया?

केंद्रीय गृह सचिव ने पुष्टि की है कि सरकार ने रायसीना हिल के चार किलोमीटर के दायरे में 24 घंटे के लिए मोबाइल इंटरनेट बंद करने की मंज़ूरी दी थी.

मोबाइल इंटरनेट नौ अक्तूबर की रात 10 बजे से 10 अक्तूबर की रात 10 बजे तक बंद रखा गया.

गृह सचिव ने इसे सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाया गया "स्थिति के मुताबिक़ उचित क़दम" बताया.

उन्होंने कहा कि ब्रॉडबैंड और वाई-फ़ाई नेटवर्क को जानबूझकर बंद नहीं किया गया था.

6. कितनी ट्रेनें रद्द की गईं?

रेलवे ने बताया कि नौ अक्तूबर की शाम चार बजे से 10 अक्तूबर के आख़िर तक दिल्ली से होकर गुज़रने या दिल्ली में अपनी यात्रा पूरी करने वाली लगभग 200 यात्री ट्रेनें रद्द की गईं.

इसके अलावा 10 अक्तूबर को सुबह चार बजे से दोपहर दो बजे के बीच दिल्ली पहुंचने वाली 41 मेल और एक्सप्रेस ट्रेनें भी रद्द की गईं.

इनमें नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचने वाली 29, निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंचने वाली नौ और तिलक ब्रिज रेलवे स्टेशन पहुंचने वाली तीन ट्रेनें शामिल थीं.

दिल्ली पुलिस ने पुष्टि की है कि उसके आदेश पर 45 मेट्रो स्टेशन 25 घंटे तक बंद रखे गए.
इमेज कैप्शन, दिल्ली पुलिस ने पुष्टि की है कि उसके आदेश पर 45 मेट्रो स्टेशन 25 घंटे तक बंद रखे गए

7. 45 मेट्रो स्टेशन 25 घंटे तक क्यों बंद रखे गए?

दिल्ली पुलिस ने पुष्टि की है कि उसके आदेश पर 45 मेट्रो स्टेशन 25 घंटे तक बंद रखे गए.

ये स्टेशन नौ अक्तूबर की रात नौ बजे से 10 अक्तूबर की रात 10 बजे तक बंद रहे.

पुलिस के हलफ़नामे में कहा गया है कि यह क़दम पहले से एहतियात के तौर पर उठाया गया था.

पुलिस के मुताबिक़, इसका मक़सद "बेक़ाबू भीड़ को संवेदनशील जगहों की ओर बढ़ने से रोकना" था.

8. क्या वकीलों और पत्रकारों को ग़ैर-क़ानूनी ढंग से हिरासत में लिया गया?

वकीलों और दूसरे पेशेवर लोगों को ग़ैर-क़ानूनी ढंग से हिरासत में लिए जाने के आरोपों पर दिल्ली पुलिस ने कहा, "न तो किसी को ग़ैर-क़ानूनी ढंग से हिरासत में लिया गया और न ही किसी पेशेवर व्यक्ति को किसी भी तरह अपनी पेशेवर ज़िम्मेदारी निभाने से रोका गया."

पुलिस का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के पास से केवल उन लोगों को हटाया गया, जो पाबंदी के आदेशों का उल्लंघन कर रहे थे.

दिल्ली पुलिस ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट जैसे सम्मानित परिसर को प्रदर्शन स्थल के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. उसकी गरिमा को हर क़ीमत पर बनाए रखना ज़रूरी है."

9. क्या कांग्रेस के प्रदर्शनों के कारण मध्य दिल्ली में जाम लगा?

दिल्ली पुलिस का दावा है कि छह, सात और आठ अक्तूबर को कांग्रेस के विरोध मार्च के कारण मध्य दिल्ली पूरी तरह जाम हो गई थी.

पुलिस के मुताबिक़, इन प्रदर्शनों के कारण सड़कों पर भारी जाम लगा और कई लोगों की उड़ानें और ट्रेनें छूट गईं.

पुलिस का दावा है कि लोगों को केवल उन्हीं इलाक़ों में हिरासत में लिया गया, जहां ये आदेश लागू थे.
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10. क्या हिरासत में लिए गए लोगों ने पुलिस की बसों में तोड़फोड़ की?

दिल्ली पुलिस का आरोप है कि छह, सात और आठ अक्तूबर को हिरासत में लेकर पुलिस की बसों में बैठाए गए लोगों ने वाहनों के टायरों में छेद कर दिए और खिड़कियों के शीशे तोड़ दिए.

पुलिस ने इन्हें "सरासर हिंसा की घटनाएं" बताया है.

11. पुलिस को किस तरह की ख़ुफ़िया जानकारी मिली थी?

दिल्ली पुलिस का दावा है कि उसे ख़ास ख़ुफ़िया जानकारी मिली थी कि 10 और 11 अक्तूबर को सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी कोई बड़ी स्थिति पैदा हो सकती है.

पुलिस का कहना है कि इसी वजह से उसने ये क़दम उठाए.

दिल्ली पुलिस ने अपनी कार्रवाई को "नेकनीयती से आधिकारिक ज़िम्मेदारी निभाते हुए उठाया गया क़दम" बताया.

पुलिस के मुताबिक़, उस समय के हालात को देखते हुए यह कार्रवाई स्थिति के मुताबिक़ उचित थी और इसका मक़सद सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी किसी बड़ी घटना को टालना था.

12. पाबंदी के आदेश किन इलाक़ों में लागू थे?

दिल्ली पुलिस का दावा है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस की धारा 163 के तहत कई पुलिस थानों ने पाबंदी के आदेश जारी किए थे.

पुलिस के मुताबिक़, ये आदेश केवल उस थाने के क्षेत्र तक सीमित नहीं थे, जिसके तहत जंतर-मंतर आता है.

हालांकि, पुलिस ने इन आदेशों को रिकॉर्ड में पेश नहीं किया है. उसने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि किन पुलिस थानों ने ये आदेश जारी किए थे.

पुलिस का दावा है कि लोगों को केवल उन्हीं इलाक़ों में हिरासत में लिया गया, जहां ये आदेश लागू थे.

नई दिल्ली के पुलिस उपायुक्त यानी डीसीपी ने इस महीने की शुरुआत में एक्स पर लिखा था कि नई दिल्ली ज़िले में ऐसे आदेश लागू थे.

यह स्पष्ट नहीं है कि इसके अलावा और किन इलाक़ों में ये आदेश लागू थे या अब भी लागू हैं.

प्रदर्शन क्यों हुआ और जुलाई की घटना का इससे क्या संबंध है?

कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े और एसआईआर को वापस लेने की मांग को लेकर प्रदर्शन बुलाया था.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, 10 और 11 अक्तूबर के दौरान दिल्ली में 7,500 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया था. इसके अगले दिन राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के नेता सरकार की कार्रवाई के विरोध में सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करने निकले थे.

दिल्ली पुलिस का कहना है कि अक्तूबर में उठाए गए क़दमों के पीछे 20 जुलाई के प्रदर्शन का अनुभव भी था.

सीजेपी ने उस समय पेपर लीक और तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था. इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की थी.

पुलिस का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान बैरिकेड तोड़े गए, सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाया गया और पुलिसकर्मियों पर हमला हुआ.

वहीं, सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने पुलिस पर प्रदर्शनकारियों, ख़ासकर महिलाओं के साथ मारपीट करने का आरोप लगाया था.

उस समय पुलिस ने पांच एफ़आईआर दर्ज की थीं. इनमें दंगा करने, सरकारी और निजी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाने और ड्यूटी कर रहे सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने से जुड़ी धाराएं लगाई गई थीं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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