ट्रंप को भारत के ख़िलाफ़ मिला नया हथियार, एक्सपर्ट्स इसे रूस से आगे का मामला क्यों बता रहे हैं?

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इमेज कैप्शन, ट्रंप ने उस बिल पर हस्ताक्षर कर दिया है, जिसमें भारत के ख़िलाफ़ 100 फ़ीसदी तक टैरिफ़ लगाने का प्रावधान है
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उस बिल पर हस्ताक्षर कर दिया है, जिसमें रूस से ऊर्जा आयात करने वाले देशों पर 100 फ़ीसदी तक टैरिफ़ लगाने का प्रावधान है.

ट्रंप के हस्ताक्षर के बाद यह बिल क़ानून बन गया है और ट्रंप को भारत के ख़िलाफ़ भी 100 फ़ीसदी तक टैरिफ़ लगाने का अधिकार मिल गया है.

गुरुवार को कड़े शब्दों में जारी एक बयान में भारत ने कहा कि उसने हाल के महीनों में इस मुद्दे पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ चर्चा की है. भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा, "न सिर्फ़ द्विपक्षीय संबंधों बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार पर भी इसके संभावित प्रभावों को भारतीय पक्ष ने बहुत स्पष्ट रूप से सामने रखा है."

अमेरिका के नए क़दम में रूसी तेल या प्राकृतिक गैस के पाँच सबसे बड़े खरीदारों को निशाना बनाया गया है. इससे भारत, चीन और अमेरिका के सहयोगी तुर्की पर नए शुल्क लगाए जाने का ख़तरा पैदा हो गया है.

अभी स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका अंततः इन नई शक्तियों का इस्तेमाल करेगा या नहीं लेकिन इससे उसे एक हथियार ज़रूर मिल गया है.

भारत के कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी क़रीब पांचवां हिस्सा है, जिससे वह भारत का सबसे बड़ा बाज़ार है. ऐसे में टैरिफ़ और बढ़ता है तो भारत के लिए बड़ा झटका होगा.

भारत के प्रति ट्रंप की नीति को कई नज़रियों से देखा जा रहा है. इस सवाल की भी समीक्षा की जा रही है कि ट्रंप वाक़ई रूस से संबंधों के कारण भारत से नाराज़ हैं या मामला उससे आगे का है.

पूर्व विदेश सचिव और अमेरिका में भारत की राजदूत रहीं निरूपमा मेनन राव मानती हैं कि दोनों देशों के बीच बढ़ता फासला का कारण केवल रूसी तेल नहीं है.

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इमेज कैप्शन, भारत की बीजेपी सरकार अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी से ज़्यादा सहज महसूस करती थी लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में स्थिति बिल्कुल बदली नज़र आ रही है

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निरूपमा मेनन राव ने एक्स पर लिखा है, ''ट्रंप की नीति दोनों देशों के बीच साझेदारी के अर्थ को लेकर एक गहरे मतभेद की ओर इशारा करती है. अमेरिका अक्सर रणनीतिक सामंजस्य को राजनीतिक बाध्यता से जोड़कर देखता है. वहीं, भारत साझेदारी को संप्रभु शक्तियों के बीच सहयोग के रूप में देखता है. इनके बीच रूस, ईरान और चीन से निपटने के तरीक़े को लेकर मतभेद बने रहेंगे. जब ऐसे मतभेदों को सार्वजनिक रूप से वफ़ादारी की परीक्षा में बदल दिया जाता है तो कूटनीति संवाद के बजाय दिखावे में बदल जाती है और समझौते या सुलह की गुंजाइश भी कम हो जाती है.''

निरूपमा मेनन राव कहती हैं, ''भारत को आहत राष्ट्रवाद के साथ प्रतिक्रिया देने की ज़रूरत नहीं है. रणनीतिक स्वायत्तता की असली कसौटी यह नहीं है कि ऐसे दबाव की कितनी तीखी आलोचना की जाती है, बल्कि यह है कि देश उस दबाव को किस हद तक झेल सकता है. इसके लिए डिफेंस सप्लाई के सोर्स में विविधता, अधिक ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी क्षमता, मज़बूत इन्फ़्रास्ट्रक्चर और लचीलापन ज़रूरी है. इन बुनियादों के बिना स्वायत्तता सिर्फ़ ऐसी बयानबाजी बनकर रह जाएगी, जिसके पीछे निर्भरता मौजूद हो.''

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''लेकिन वॉशिंगटन को भी अपने रुख़ में मौजूद विरोधाभास को समझना होगा. वह चाहता है कि भारत एशिया में अमेरिका के अनुकूल शक्ति संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाए लेकिन दूसरी ओर नई दिल्ली से अपनी स्वतंत्र रणनीतिक सोच और फ़ैसले लेने की आज़ादी सीमित करने की अपेक्षा करता है. एक मज़बूत भारत की ज़रूरत और एक ऐसे भारत की अपेक्षा, जो अमेरिकी रुख़ के मुताबिक़ चले, दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकतीं.''

निरूपमा मेनन राव ने लिखा है, ''यह संबंध इतना अहम है कि इसे इस बहस तक सीमित नहीं किया जा सकता कि कौन किससे कितना तेल ख़रीदता है. भारत को तकनीक, निवेश और एशिया में शक्ति संतुलन के लिए अमेरिका की ज़रूरत है. अमेरिका को ऐसे भारत की ज़रूरत है जो सक्षम, आत्मविश्वासी हो और चीन के प्रभुत्व का सामना कर सके.''

''दोनों देशों को दोस्ती की भावुक पुष्टि की ज़रूरत नहीं है. दोनों को सीमाओं की अधिक स्थिर समझ की ज़रूरत है. भारत को रणनीतिक स्वायत्तता को राष्ट्रीय क्षमता में बदलना होगा और अमेरिका को यह समझना होगा कि साझेदारी, दूसरे पक्ष की अधीनता का दूसरा नाम नहीं है. काम मतभेदों को ख़त्म करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर मतभेद दोनों देशों के संबंधों पर जनमत संग्रह में न बदल जाए.''

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इमेज कैप्शन, इसी महीने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिका जाने वाले हैं

अमेरिका कैसा भारत चाहता है?

अमेरिका के उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडो ने इसी साल मार्च में कहा था कि अमेरिका भारत को उसी तरह के आर्थिक फ़ायदे नहीं देगा, जैसे उसने चीन को दिए थे, जिनकी बदौलत चीन एक बड़ा प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरा.

लैंडो ने जियोपॉलिटिक्स और जियो-इकनॉमिक पर नई दिल्ली में आयोजित रायसीना डायलॉग में कहा था, ''भारत को यह समझना चाहिए कि हम वही ग़लतियां नहीं दोहराएंगे, जो हमने 20 साल पहले चीन के साथ की थीं."

लैंडो के इस बयान से एक स्पष्ट संदेश गया था कि अमेरिका भारत को अपने मातहत देखना चाहता है न कि बराबरी की आकांक्षा रखने वाला.

ब्रह्मा चेलानी नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में स्ट्रैटिजिक स्टडी के प्रोफ़ेसर और बर्लिन स्थित रॉबर्ट बॉश अकादमी में फेलो हैं. चेलानी नौ किताबों के लेखक हैं, जिनमें 'वॉटर: एशियाज़ न्यू बैटलग्राउंड" भी शामिल है.

चेलानी ने इसी साल तीन जून को प्रोजेक्ट सिंडिकेट में लिखा था, ''ट्रंप के 2025 में व्हाइट हाउस लौटने से काफ़ी पहले ही दोनों देशों के बीच संबंध दबाव में आ गए थे. हाल के वर्षों में चीन की बढ़ती रणनीतिक मौजूदगी के कारण क्षेत्र में भारत की स्थिति लगातार कमज़ोर हुई है. ऐसे में अमेरिका ने भारत के रणनीतिक पड़ोस में ऐसी नीतियां अपनाई हैं, जिनमें भारतीय हितों की अनदेखी हुई है और कुछ मामलों में वे सीधे उनके ख़िलाफ़ भी रही हैं.''

चेलानी कहते हैं, ''मिसाल के तौर पर बांग्लादेश को लीजिए. 2024 में प्रधानमंत्री शेख़ हसीना की सरकार को सेना के समर्थन से हटाए जाने के बाद अमेरिका ने सत्ता परिवर्तन का समर्थन किया. लेकिन भारत को पहले से पता था कि इससे गंभीर जोखिम पैदा हो सकते हैं और अब वे जोखिम सामने भी आ गए हैं. भारत की पूर्वी सीमा पर स्थिरता के लिए ख़तरा पैदा हो गया है.''

''फिर म्यांमार का मामला है. 2021 में सेना की ओर से निर्वाचित सरकार को हटाए जाने के बाद से अमेरिका ने सैन्य शासन के प्रति सख़्त रुख़ बनाए रखा है. इसमें कड़े प्रतिबंध और विद्रोही समूहों को "ग़ैर-घातक" सैन्य सहायता देना भी शामिल है. यह सब भारत की संवेदनशील पूर्वोत्तर सीमा के पास पैदा होने वाले सुरक्षा जोखिमों के बावजूद किया गया है.''

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इमेज कैप्शन, जिस नए बिल में भारत के ख़िलाफ़ 100 फ़ीसदी टैरिफ़ का प्रावधान है, उसका समर्थन डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने भी किया है

भारत सहयोगी नहीं प्रतिद्वंद्वी?

चेलानी ने लिखा है, ''अमेरिका ने नेपाल को भी अब अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं में अलग से शामिल करना शुरू कर दिया है. नेपाल भौगोलिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से भारत से गहराई से जुड़ा हुआ है, लेकिन अमेरिका अब उसे अपनी भारत नीति के हिस्से के बजाय अपने आप में एक रणनीतिक प्राथमिकता के तौर पर देख रहा है. हाल के वर्षों में अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारी काठमांडू का दौरा पहले से अधिक करने लगे हैं और कई बार इन दौरों में नई दिल्ली की उनकी पारंपरिक यात्रा शामिल नहीं होती.''

''ट्रंप ने स्थिति को और जटिल बना दिया है, ख़ासकर पाकिस्तान के साथ क़रीबी संबंध बढ़ाने की उनकी कोशिशों से. ट्रंप के परिवार के सदस्यों और कारोबारी सहयोगियों ने पाकिस्तान में मुनाफ़े वाले कारोबारी समझौते किए हैं और ऐसा लगता है कि ट्रंप प्रशासन के लिए यही वजहें उपमहाद्वीप में पुराने और ख़तरनाक रणनीतिक समीकरणों को फिर से बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त हैं.''

चेलानी कहते हैं, ''अमेरिका ने चीन के प्रति भी अब अधिक सुलह वाला रुख़ अपनाना शुरू कर दिया है. हालांकि दोनों महाशक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा अब भी काफ़ी तीखी है, लेकिन हाल में कुछ मुद्दों पर ट्रंप के रुख़ में नरमी और समझौते की कोशिशों ने काफ़ी अनिश्चितता पैदा कर दी है. इसका असर ख़ास तौर पर भारत पर पड़ता है, क्योंकि अमेरिका के लिए भारत की अहमियत लंबे समय से इस क्षमता में रही है कि वह क्षेत्र में चीन के प्रभाव के मुक़ाबले एक संतुलन कायम कर सके.''

अमेरिकी विदेश विभाग के सहायक विदेश मंत्री समीर पॉल कपूर ने इसी साल फ़रवरी में कहा था, अमेरिका दक्षिण एशिया में किसी एक शक्ति को ज़्यादा प्रभाव हासिल करने से रोकना चाहता है. कपूर की यह बात ट्रंप प्रशासन की नेशनल सिक्यॉरिटी स्ट्रैटिजी (एनएसएस) में कही गई बातों से भी मेल खाती है.

इसके मुताबिक़, अमेरिका किसी भी देश को इतना प्रभावशाली नहीं बनने दे सकता कि वह अमेरिकी हितों के लिए ख़तरा बन जाए. इसके लिए अमेरिका को वैश्विक और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बनाए रखना होगा.

2017 की पिछली नेशनल सिक्यॉरिटी स्ट्रैटिजी के उलट, नई एनएसएस में भारत का उल्लेख बहुत कम है. इसमें सिर्फ़ इतना कहा गया है कि अमेरिका भारत के साथ व्यावसायिक और अन्य संबंधों को बेहतर करना चाहता है, ताकि भारत को हिंद-प्रशांत की सुरक्षा में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके.

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वॉशिंगटन स्थित अटलांटिक काउंसिल के वरिष्ठ फेलो माइकल कुगलमैन ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, "पिछले एक साल में कई वजहों से अमेरिका-भारत संबंधों को नुक़सान पहुँचा है, जिसमें अमेरिकी टैरिफ़ भी शामिल हैं. लेकिन यह नया क़ानून, जिसे दोनों दलों का मज़बूत समर्थन मिला है और जो रूस से भारत की तेल ख़रीद पर उसे दंडित करने के लिए सबसे कड़ा रुख़ अपनाता है, अब तक का सबसे बड़ा झटका हो सकता है."

उन्होंने कहा कि अगर वॉशिंगटन टैरिफ़ लागू करने में देरी करता है या उन्हें सीमित स्तर पर लागू करता है, तो नुक़सान को संभाला जा सकता है. हालांकि, उनके मुताबिक, इस क़ानून से नई दिल्ली में व्यापार समझौते को लेकर अविश्वास की खाई और चौड़ी हो सकती है और भारतीय वार्ताकारों के लिए समझौते को अंतिम रूप देने के लिए ज़रूरी आख़िरी दौर की रियायतों पर सहमत होना मुश्किल हो सकता है.

उन्होंने कहा, "व्यापार वार्ता के नज़रिए से देखें तो यह नया क़ानून इससे ख़राब समय पर नहीं आ सकता था. दोनों पक्ष समझौते की मंज़िल से बहुत दूर नहीं हैं, लेकिन वहाँ तक पहुँचने के लिए सावधानीपूर्वक कूटनीति की ज़रूरत होगी."

ट्रंप का नया बिल भारत में पहले ही एक राजनीतिक मुद्दा बन चुका है. विपक्ष मोदी से अधिक कड़ा रुख़ अपनाने की मांग कर रहा है. पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में किसी भी बढ़ोतरी का मोदी के लिए राजनीतिक जोखिम हो सकता है, क्योंकि अगले साल की शुरुआत से भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश, पंजाब और मोदी के गृह राज्य गुजरात में चुनाव होने हैं. मोदी की पार्टी बीजेपी उत्तर प्रदेश और गुजरात, दोनों राज्यों में सत्ता में है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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