ट्रंप की चीन से बढ़ती क़रीबी ने भारत और पाकिस्तान के लिए मुश्किलें कैसे खड़ी कर दीं?

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बीता हफ्ता भारत और पाकिस्तान के लिए दो अहम मोड़ लेकर आए, इसने दोनों मुल्कों को कुछ राहत और कुछ चिंताओं में डाल दिया.

23 मई को भारत आकर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दोनों देशों में दोबारा गर्मजोशी भरने की कोशिश की. मगर क्वाड को लेकर ट्रंप प्रशासन के पहले जैसे उत्साह से दूर रहने के संकेत भारत के लिए चिंता छोड़ गए हैं.

उधर, 25 मई को पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ज़ोर देकर अब्राहम समझौते में शामिल होने को कहा. फ़लस्तीन का मुद्दा पाकिस्तान के लिए संवेदनशील रहा है और वह इसराइल को मान्यता नहीं देता है. ऐसे में यह पाकिस्तान के लिए न निगलने और न उगलने वाली स्थिति बन गई है.

दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों ने इसे चीन के इन दोनों क्षेत्रों में बढ़ते प्रभाव से जोड़कर देखा है. उनका कहना है कि ट्रंप ने चीन पर रुख़ नरम किया है, लेकिन दक्षिण एशिया में अपनी रणनीतिक साझेदारी को फैलाने की राह पकड़ी है. इससे अमेरिका की निगाह में भारत की अहमियत कुछ घट सकती है.

उधर, मध्यपूर्व में इसराइल के ज़रिए अमेरिका अपना प्रभुत्व बढ़ाना चाहता है, जिसके लिए वह पाकिस्तान और अन्य देशों से संबंध बहाली का दबाव बना रहा है.

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अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इन दो घटनाओं की अहमियत को गहराई से समझने के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने साप्ताहिक कार्यक्रम 'द लेंस' में दो विशेषज्ञों से चर्चा की.

चर्चा में शामिल हुईं वॉशिंगटन से पत्रकार इरम अब्बासी. साथ ही, इसमें भाग लिया पत्रकार खुशबू राजदान ने जो अमेरिका, चीन और भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर नज़र रखती हैं.

अब्राहम समझौता पाकिस्तान के लिए कितनी बड़ी चुनौती?

पाकिस्तान राष्ट्रपति ट्रंप की गुड-बुक में रहना चाहता है. लेकिन घरेलू राजनीति में फ़लस्तीन एक अहम फैक्टर है, इस पर पाकिस्तान का सैद्धांतिक रुख रहा है. ऐसे में अब्राहम समझौते को लेकर ट्रंप की मांग और घरेलू- क्षेत्रीय राजनीति को बैलेंस करना पाकिस्तान के लिए कितना चुनौतीपूर्ण होगा?

पत्रकार इरम अब्बासी ने अब्राहम समझौते में पाकिस्तान के शामिल होने की संभावना को फिलहाल की स्थितियों में असंभव माना है. उनका कहना है कि पाकिस्तान में धार्मिक समूहों के ज़मीनी स्तर पर मजबूत असर के चलते किसी भी सरकार या सेना के लिए अब्राहम समझौते जैसे कदम उठाना फिलहाल बेहद मुश्किल है.

वह ग़ज़ा युद्ध का उदाहरण देती हैं कि "जब ट्रंप ने पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय टास्क फोर्स में शामिल होने को कहा ताकि 'हमास का मुकाबला' किया जा सके तो पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन हुए थे.

वह कहती हैं, "पाकिस्तान में धार्मिक धड़े हों या राजनीतिक दल, चुनी हुई सरकार हो या फौज, सबने हमेशा फ़लस्तीन को एक अहम मुद्दा माना है. पहले और अब भी इसराइल के मुद्दे पर सभी लगभग एकमत रहे हैं. ऐसे में इसराइल के साथ संबंध सामान्य करना असंभव लगता है."

हालांकि उनका मानना है कि अगर सऊदी अरब जैसे देशों की तरफ से इसराइल के साथ संबंध सामान्य करने की कोशिश होती है, तो वह भी पाकिस्तान के लिए एक जटिल स्थिति पैदा कर सकती है.

इरम कहती हैं, "इन देशों की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय से इस धारणा पर टिका रहा है कि फ़लस्तीन को एक स्वतंत्र राज्य का दर्जा मिले, तभी इसराइल के साथ बातचीत संभव होगी. ऐसे में इनके बीच संबंध सामान्य हुए तो यह पाकिस्तान को मुश्किल में डालने वाली बात है."

इस मामले पर पत्रकार खुशबू राजदान का कहना है कि तुर्की और पाकिस्तान जैसे देश फ़लस्तीन के मुद्दे को बिल्कुल नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते, हालांकि अब्राहम समझौते में फ़लस्तीन का कोई उल्लेख नहीं है. इसका असर कश्मीर मुद्दे पर भी पड़ सकता है.

वह कहती हैं, "अगर पाकिस्तान, फ़लस्तीन मुद्दे को छोड़कर अब्राहम समझौते 2.0 पर हस्ताक्षर कर देता है, तो उसकी कश्मीर नीति भी कमज़ोर हो सकती है. इसलिए मेरा मानना है कि भारत को भी इस पर नज़र रखनी होगी कि पाकिस्तान आगे क्या कदम उठाता है."

अमेरिका की नज़र में पाकिस्तानी सेना क्या पावर सेंटर है?

राष्ट्रपति ट्रंप ने अब्राहम समझौते से छह देशों को 'अनिवार्य रूप से' जोड़ने की बात ट्रूथ सोशल पर लिखते हुए पाक फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को टैग किया. जबकि बाकी पांच देशों के चुने हुए प्रतिनिधियों को संबोधित किया. ऐसे में सवाल है कि अमेरिका में इसे क्या जानबूझकर उठाए गए क़दम के रूप में देखा जा रहा है?

पत्रकार इरम अब्बासी कहती हैं कि अमेरिका या दक्षिण एशिया के विश्लेषकों ने यह बात नोटिस की है. वह कहती हैं, "राष्ट्रपति ट्रंप जब भी पाकिस्तान का ज़िक्र करते हैं तो वो अधिकतर फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की बात करते हैं.

इससे यही ज़ाहिर होता है कि अमेरिका का पारंपरिक दृष्टिकोण रहा है कि पाकिस्तान में रावलपिंडी (सेना का मुख्यालय) ही विदेश नीति चलाता है और वही मुल्क चलाता है, न कि चुनी हुई नागरिक सरकार."

इरम कहती हैं, "राष्ट्रपति ट्रंप ने बाकी देशों के चुने हुए नेता और पाकिस्तान के आसिम मुनीर का नाम लेकर एक बार फिर यह बात मज़बूत कर दी है कि पाकिस्तान को वास्तव में उसकी सेना ही चला रही है.

उनका इशारा यह है कि मुनीर ही ऐसे शख्स हैं जो उनके लिए वह काम कर सकते हैं (अब्राहम समझौते में पाकिस्तान को शामिल करना). इसलिए जहाँ असली सत्ता का केंद्र है, वे उसी का नाम लेते हैं."

क्वाड बैठक और भारत

हाल में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का भारत दौरा क्वाड पर क्या संकेत देता है? और क्या अगर भारत इंडो-पैसिफिक में अमेरिका का पूरा साथ नहीं देता, तो क्या इससे अमेरिका की रणनीतिक स्थिति कमजोर पड़ेगी?

इस पर पत्रकार खुशबू राजदान का मानना है कि यह दौरा रिश्तों में संतुलन बनाने और भारत की चिंताओं को कम करने की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.

हालांकि, साथ ही यह भी संकेत दिया गया कि ट्रेड और टैरिफ को लेकर ट्रंप की सख्त मांगें बनी रहेंगी और वीज़ा से जुड़ी समस्याओं पर कोई राहत नहीं मिलेगी.

खुशबू राजदान का मानना है कि क्वाड बैठक और हाल के घटनाक्रमों के बाद भारत के सामने राहत और चिंता दोनों बनी हुई हैं. भारत को अब यह तय करना होगा कि वह अमेरिका और चीन दोनों के साथ अपने रिश्तों को किस तरह संतुलित करता है.

बता दें कि भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक रणनीतिक और अनौपचारिक सुरक्षा समूह का नाम क्वाड है. इसका मुख्य मकसद हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करना है.

पत्रकार खुशबू राजदान क्वाड को लेकर कहती हैं, "क्वाड को लेकर भी अनिश्चितता बढ़ी है. 2024 में ट्रंप के कार्यकाल से पहले अमेरिका ने क्वाड समिट की मेजबानी की थी, फिर भारत को 2025 में क्वाड समिट करनी थी लेकिन ट्रंप ने आने से बिल्कुल इनकार कर दिया.

और अब जो क्वाड की चेयरमैनशिप है वो ऑस्ट्रेलिया के पास जा रही है. ट्रंप अभी तक किसी क्वाड समिट में शामिल नहीं हुए हैं."

साथ ही पत्रकार राजदान भारत और अमेरिका के क्वाड ग्रुप को लेकर अलग-अलग प्राथमिकताओं और मकसदों को भी रेखांकित करती हैं.

उन्होंने कहा कि बाइडन के जमाने में अमेरिका क्वाड को रक्षा ग्रुप बनाना चाहता था, मगर भारत ने कहा कि वह इसे एक सैन्य गठबंधन की तरह नहीं देखता.

मगर अब देखा जा सकता है कि ट्रंप के सत्ता में आने के बाद रक्षा संबंधी ज्यादा गतिविधियां हो रही हैं. अमेरिकी विदेश मंत्री रुबियो आकर इंडो-पैसिफिक सर्विलेंस की बात करते हैं. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार भी क्वाड की बात नहीं की है.

वह कहती हैं कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत अहम है, लेकिन अमेरिका अब केवल उसी पर निर्भर नहीं है. जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया भी महत्वपूर्ण साझेदार हैं. ट्रंप प्रशासन भारत को ज़रूरी तो मानता है, लेकिन उसे एकमात्र केंद्र में नहीं रख रहा.

वह कहती हैं कि भारत-अमेरिका के लिए व्यापार और वीज़ा का मुद्दा अहम है. वह कहती हैं कि इस मामले में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भले कहा कि अमेरिकी की इमीग्रेशन नीति भारतीयों को टारगेट नहीं कर रही है लेकिन ऐसा नहीं है. वह कहती हैं कि "मुझे लगता है कि अमेरिकी विदेश मंत्री भारतीयों को भरमा रहे हैं."

खुशबू राजदान कहती हैं कि भारत और अमेरिका दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है, क्योंकि भारत के चीन और पाकिस्तान दोनों के साथ सीमा विवाद हैं.

वहीं, अमेरिका भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ रिश्तों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है. वह कहती हैं कि ट्रंप प्रशासन में 'गुड कॉप-बैड कॉप' नीति दिखती है, जहां एक ओर ट्रंप पाकिस्तान के साथ नज़दीकी बढ़ाते हैं, वहीं दूसरी ओर रुबियो भारत से संवाद बनाए रखते हैं.

फिलहाल संकेत यही हैं कि ट्रंप प्रशासन में पाकिस्तान को कुछ मामलों खासकर मध्य पूर्व और इसराइल से जुड़े मुद्दों पर अपेक्षाकृत ज्यादा प्राथमिकता मिल रही है.

अमेरिका क्या अब भारत से निर्भरता घटा रहा है?

ऐसा माना जाता है कि पूर्व अमेरिकी सरकारों के दौर में दक्षिण एशिया को लेकर भारत पर काफी अधिक निर्भरता दिखाई थी. क्या अमेरिका, दक्षिण एशिया क्षेत्र में अपने संबंधों और रणनीति को फिर से संतुलित करता हुआ नज़र आ रहा है? क्या अमेरिका चीन को साथ लेकर चलने की रणनीति बना रहा है?

इसके जवाब में पत्रकार इरम कहती हैं कि "मेरा मानना है कि भारत अमेरिका का एक अहम साझेदार बना रहेगा. चाहे वह रक्षा, तकनीक या व्यापार के क्षेत्र में हो. लेकिन फिलहाल पाकिस्तान की अमेरिका को जरूरत है."

उनका कहना है कि भारत के साथ एक दीर्घकालिक साझेदारी को अमेरिका के नीति-निर्माता भी इसी नजरिए से देखते हैं.

दूसरी ओर, साउथ एशियन हेराल्ड और साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के लिए काम करने वालीं पत्रकार और विश्लेषक खुशबू राजदान का कहना है कि अमेरिका और चीन के बीच के रिश्ते सुधर रहे हैं. वह संकेत देती हैं कि पहले जैसे अमेरिका दक्षिण एशिया में भारत को चीन के मुकाबले संतुलन लाने (काउंटर बैलेंस) के रूप में देखता था, अब कुछ हद तक ये बदलता दिख रहा है.

वह कहती हैं, "ट्रंप-2.0 से पहले के जो बाइडन प्रशासन में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लिए भारत को चीन के मुकाबले के रुप में देखा गया था. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार भी सार्वजनिक तौर पर यह नहीं कहा है कि अमेरिका, भारत को चीन के खिलाफ एक संतुलन के रूप में देखता है."

डोनाल्ड ट्रंप चीन गए, भारत क्यों नहीं आए ?

अंतरराष्ट्रीय संबंधों की विश्लेषक खुशबू राजदान कहती हैं कि डोनाल्ड ट्रंप बार-बार कहते हैं कि शी जिनपिंग उनके बहुत अच्छे दोस्त हैं, और वह यह भी कहते हैं कि नरेंद्र मोदी भी उनके करीबी मित्र हैं.

वह कहती हैं कि प्रैक्टिकली देखा जाए तो ट्रंप अपने "चीनी दोस्त" से मिलने के लिए बीजिंग जाते हैं, जबकि अपने "भारतीय दोस्त" से मिलने भारत नहीं आते. ऐसे में बिना कुछ कहे भी यह बहुत कुछ संकेत दे देता है.

वह कहती हैं कि जब से डोनाल्ड ट्रंप फिर से सत्ता में आए हैं, तब से दोनों देशों के रिश्ते कुछ नाज़ुक दौर से गुजर रहे हैं. वे व्यापार समझौते का उदाहरण देते हुए मोदी की फरवरी-2025 की याद दिलाती हैं, "इस यात्रा में दोनों नेताओं ने अमेरिका से ऊर्जा आयात को लेकर चर्चा हुई थी. लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर चली बातचीत सफल नहीं हो सकी. ये बातचीत लंबी खिंचती चली गई."

वह अपने सूत्रों का हवाला देते हुए दावा करती हैं, "भारत ने कई बार यह संकेत दिया कि वह अमेरिका से और ज्यादा खरीदारी करने को तैयार है. चाहे वह ऊर्जा हो या अन्य क्षेत्र में. लेकिन इसके बावजूद ट्रंप को संतुष्ट करना आसान नहीं रहा. इसी वजह से ट्रंप ने यह तक कहा कि वह भारत का दौरा नहीं करेंगे."

उनका कहना है कि ट्रंप के उलट पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन बार-बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलते रहे थे.

वह यह भी कहती हैं कि भारत में कूटनीतिक विशेषज्ञ मान रहे हैं कि ट्रंप और मोदी के बीच सीधी मुलाकात 'टाली' जा रही है, ताकि कोई असहज स्थिति या अचानक बयानबाज़ी से रिश्तों पर असर न पड़े, जब तक डील पर सहमति न बन जाए.

दक्षिण एशिया में बढ़ता चीन का असर और ट्रंप का नरम रुख

क्या ट्रंप प्रशासन का चीन के प्रति रुख पहले के अमेरिकी प्रशासन से अलग है, और क्या वह भारत को चीन के संतुलन के बजाय चीन के साथ सहयोग की रणनीति अपनाता हुआ दिख रहा है?

इसके जवाब में पत्रकार इरम अब्बासी कहती हैं कि दक्षिण एशिया की राजनीति में चीन का असर बढ़ा है, जिससे ट्रंप के रुख में बदलाव आया है.

वह कहती हैं कि खासकर ईरान युद्ध के बाद चीन की भूमिका एक ऐसे खिलाड़ी के रूप में उभर रही है, जिसके साथ हर देश जाकर बातचीत करना चाहता है, चाहे यूक्रेन का मसला हो या ईरान का.

वह कहती हैं, "राष्ट्रपति ट्रंप से पहले कुछ यूरोपीय नेता भी चीन गए थे, वॉशिंगटन लौटने पर राष्ट्रपति ट्रंप ने भी कहा कि चीन होर्मुज़ स्ट्रेट को खोलने में मदद करेगा.

फिर जैसे ही ट्रंप लौटे, उसके बाद पुतिन भी चीन गए. ऐसा लगता है कि चीन के पास अन्य देशों की मदद करने और कई संघर्षों में हस्तक्षेप करने के लिए अधिक लेबरेज (प्रभाव) मौजूद है."

इरम बताती हैं कि "अमेरिका के थिंक टैंक भी इस बात को मान रहे हैं और वे चीन के बढ़ते असर को न सिर्फ दक्षिण एशिया में बल्कि इसके बाहर भी बढ़ता हुआ देख रहे हैं."

उधर, पत्रकार खुशबू राजदान कहती हैं कि जो बाइडन ने चीन पर ज्यादा प्रतिबंध लगाए थे, ट्रंप ने इसकी आलोचना की थी. और ट्रंप का रुख अपने पूर्ववर्ती के मुकाबले चीन के प्रति नरम रहा है.

इस्लामिक वर्ल्ड का नया ढांचा बनाने की कोशिश

क्या राष्ट्रपति ट्रंप अब्राहम समझौते को आगे बढ़ाकर मुस्लिम प्रभाव वाले देशों तक ले जाना चाहते हैं और इस तरह मुस्लिम दुनिया में कोई नया ढांचा तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं?

इस पर सहमति जताते हुए अंतरराष्ट्रीय संबंधों की पत्रकार खुशबू राजदान कहती हैं कि यह अमेरिका के लिए एक बड़ा अवसर है. युद्ध के चलते ईरान इस समय काफी हद तक अलग-थलग पड़ चुका है. ईरान ने पड़ोसी खाड़ी मुल्कों के नागरिक ढांचे पर जवाबी हमले किए जिससे खाड़ी देशों में ईरान के प्रति अविश्वास और डर बढ़ गया. उन्हें यह आशंका है कि ईरान कभी भी उन पर हमला कर सकता है.

ऐसे में खाड़ी देश अमेरिका के साथ मिलकर एक ऐसा सुरक्षा ढांचा बनाने की सोच रहे हैं, जिससे वे ईरान के खतरे से बच सकें.

इस दौरान हिज़्बुल्लाह, हूती विद्रोही और हमास जैसे समूह भी काफी कमजोर पड़े हैं, जिससे ईरान और अधिक अलग-थलग दिखाई देता है.

इस स्थिति ने वॉशिंगटन को यह अवसर दिया है कि वह अन्य मुस्लिम देशों, खासकर खाड़ी देशों को यह समझाए कि ईरान एक खतरा है. इसलिए उन्हें इसराइल के साथ अपने संबंध सामान्य करने चाहिए. इसके बदले अमेरिका उन्हें खुफिया जानकारी, एंटी-मिसाइल डिफेंस और सुरक्षा सहयोग देने की पेशकश कर सकता है. हालांकि, कई मुस्लिम देशों के सामने एक बड़ी चुनौती भी है. फ़लस्तीन का मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक भी है. ऐसे में इसमें शामिल होना पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों के लिए काफी मुश्किल काम है.

मध्य पूर्व में पाकिस्तान के लिए क्या कोई रोल तैयार हो रहा है?

पाकिस्तान को अब्राहम समझौते में शामिल होने का ट्रंप का न्योता क्या महज़ सांकेतिक है या वे उसे गंभीर भूमिका देने का विचार कर रहे हैं? क्या कोई एक खास फैक्टर इस समय पाकिस्तान को महत्वपूर्ण बना रहा है, या फिर ट्रंप की विदेश नीति इसे लंबी अवधि की रणनीति के हिस्से के रूप में देख रही है?

इस सवाल के जवाब में बीबीसी से जुड़ी पत्रकार इरम अब्बासी का कहना है कि खाड़ी में तनाव के बीच पाकिस्तान का रोल अहम रहा है, उसके प्रयासों की राष्ट्रपति ट्रंप ने भी सराहना की है.

वह कहती हैं, "इस पूरे ख़ित्ते (क्षेत्र) में जो पावर शिफ्ट हो रहा है, उसकी वजह से पाकिस्तान की इस वक्त तो अहमियत नज़र आती है.

मगर अमेरिका में कई विश्लेषक इतिहास का हवाला देकर बताते हैं कि पाकिस्तान का किरदार रणनीतिक दृष्टिकोण से ही देखा जाता है, चाहे अफगानिस्तान युद्ध का मामला रहा हो या अब ईरान युद्ध के समय.

पत्रकार इरम अब्बासी कहती हैं कि इस वक्त यह कहना मुश्किल है कि क्या अमेरिका का रुख पाकिस्तान की ओर मुड़ रहा है या पाकिस्तान इस क्षेत्र की राजनीति में एक अहम प्लेयर बनकर उभर रहा है.

मगर वे जोड़ती हैं कि मध्यपूर्व में चीन के बढ़ते क़दमों ने अमेरिका को एक विविध किस्म की रणनीतिक साझेदारी को अपनाने पर मजबूर किया है.

इस मामले में पत्रकार खुशबू राजदान का मानना है कि प्रशांत क्षेत्र और दक्षिण एशिया के अलावा, पिछले दो-तीन वर्षों में इस्राइल और मध्य पूर्व की जो स्थिति बनी है, उसमें ट्रंप के लिए पाकिस्तान की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गई है.

साथ ही वह हाल के हफ्तों में चले शांति समझौते की कोशिशों का ज़िक्र करते हुए पाक की अहमियत को रेखांकित करती हैं.

वह कहती हैं, "ईरान पीस टॉक्स के लिए पाकिस्तान के ज़रिए ही बात करने को आमादा है."

पत्रकार इरम अब्बासी मानती हैं कि अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप के रवैये के चलते पाकिस्तान समेत बाकी कुछ देशों उन्हें 'खुश करने की दौड़' में शामिल हैं.

वे कहती हैं, "राष्ट्रपति ट्रंप के शासन करने का जो तरीका है, उसमें इसी तरह आप अपने आपसी संबंधों को बेहतर बना सकते हैं. यही स्मार्टनेस पाकिस्तान के इस्टैबलिश्मेंट (अनौपचारिक पावर सेंटर) ने दिखाई है.

चाहे वह बलूचिस्तान के खनिजों तक अमेरिका को पहुंच देने की बात हो या क्षेत्रीय सहयोग देना. पाकिस्तान आगे बढ़कर अपनी भूमिका दिखा रहा है.

इसलिए अमेरिका और दक्षिण एशिया के विश्लेषक भी यह मानते हैं कि अमेरिका की नीति में कोई बहुत बड़ा बदलाव नज़र नहीं आता. फिलहाल स्थिति यह है कि इस समय अमेरिका को पाकिस्तान की जरूरत है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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