अंफन तूफ़ान ने कैसे विश्व धरोहर सुंदरबन को किया तबाह

सुंदरबन

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    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए

"चक्रवाती तूफ़ान हमारे साथी रहे हैं. हमने पीढ़ियों से उनके साथ जीना सीख लिया था. लेकिन अंफन ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया. मैंने अपनी जिंदगी में कभी ऐसा तूफ़ान नहीं देखा था."

93 साल के सोमेश्वर मंडल बताते हैं कि वो दूसरे विश्वयुद्ध से लेकर देश की आज़ादी और दुनियाभर में होने वाले प्राकृतिक विपदाओं के गवाह रहे हैं. लेकिन ऐसी कोई आपदा पहले कभी नहीं देखी थी जिसने यूनेस्को के विश्व धरोहरों की सूची में शामिल सुंदरबन इलाक़े की तस्वीर ही बदल दी है.

पश्चिम बंगाल के उत्तर और दक्षिण 24-परगना ज़िले में लगभग 4200 वर्ग किलोमीटर में फैले और बांग्लादेश से सटे इस इलाक़े में रहने वाले लगभग 40 लाख लोगों के लिए अंफन बर्बादी की नई दास्तां लेकर आया था.

अब तूफ़ान में सब कुछ तबाह हो जाने के बाद इलाक़े से एक बार फिर बड़े पैमाने पर विस्थापन का अंदेशा है. यानी तस्वीर के साथ इलाके की तकदीर बदलने का भी ख़तरा बढ़ गया है.

इससे पहले वर्ष 2009 में आइला तूफ़ान के बाद भी ऐसा ही विस्थापन देखने को मिला था.

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रोज़गार ही नहीं जैव-विविधता भी तूफ़ान ने छीनी

कुछ साल पहले हुए एक अध्ययन के मुताबिक, इलाक़े में हर पांच घरों में से एक व्यक्ति रोज़ी-रोटी कमाने के लिए दूसरे राज्यों में रहता है. अब इस आंकड़े के तेज़ी से बढ़ने का अंदेशा है.

अंफन ने इलाके के लोगों की जमा-पूंजी और रोज़गार के साधनों ही नहीं बल्कि इलाक़े की जैव-विविधता और मैंग्रोव के जंगल को भी तबाह कर दिया है. वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि लगभग एक-तिहाई जंगल साफ हो गया है.

अंफन ने इलाके में बहने वाली गंगा, इच्छामती और कालिंदी समेत तमाम छोटी-बड़ी नदियों पर बने बांधों को तो भारी नुकसान पहुंचाया ही है, आजीविका के सबसे प्रमुख साधन खेती को भी तबाह कर दिया है.

बांधों के टूटने या उनमें दरार होने की वजह से बंगाल की खाड़ी का खारा पानी नदियों के रास्ते खेतों में पहुंच गया है. इस वजह से अब बरसों उनमें कोई फसल नहीं उगेगी.

इलाके के मौसुनी द्वीप पर रहने वाले प्रदीप मंडल कहते हैं, "लॉकडाउन ने पहले ही हमें पंगु बना दिया था. अब अंफन ने हमसे बची-खुची पूंजी भी छीन कर सड़क पर ला दिया है. हमारे घर और खेत दोनों बर्बाद हो गए हैं."

इसी इलाके की शमीमा मंडल कहती हैं, "पहले हमारे घर के लोग यहीं खेती-बारी, मछली पालन और जंगल से शहद निकालकर आजीविका चलाते थे. लेकिन आइला के बाद समुद्र के बढ़ते जलस्तर की वजह से बस्ती और खेतों के डूबने की वजह से ज़्यादातर लोग कमाने के लिए बाहरी राज्यों में चले गए. अब इस तूफ़ान ने हमारे सिर से छत भी छीन ली है. पता नहीं आगे क्या होगा?"

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कई सपने भी अंफन ने किए चकनाचूर

सुंदरबन के स्व-सहायता समूह की महिलाओं को प्रशिक्षण देने वाले एक गैर-सरकारी संगठन के संयोजक रमेश गिरि कहते हैं, "बीते तीन-चार वर्षों के दौरान कई प्रवासियों ने लौटकर अपना छोटा-मोटा कारोबार शुरू किया था. तस्वीर बेहतर हो ही रही थी कि अंफन ने तमाम किए-धरे पर पानी फेर दिया है."

काकद्वीप इलाके के प्रणब विश्वास का बेटा अभी तूफ़ान से एक सप्ताह पहले ही महाराष्ट्र में नासिक से लौटा था. अब बाप-बेटे मिलकर मछली के कारोबार की योजना बना रहे थे. लेकिन अंफन उनके तमाम सपनों के साथ कच्चे मकान को भी अपने साथ उड़ा ले गया.

मंडल को अब समझ में नहीं आ रहा है कि छह लोगों के परिवार को वै कैसे पालेंगे? ऊपर से दो बेटियां ब्याह के लायक हैं.

पश्चिम बंगाल सरकार में सुंदरबन मामलों के मंत्री मंटूराम पाखिरा कहते हैं, "तूफ़ान से इलाके को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. अब सब कुछ शून्य से दोबारा शुरू करना होगा. लगभग 140 किलोमीटर लंबे बांधों में जगह-जगह दरारें पड़ गई हैं. इनसे ज्वार-भाटे के समय समुद्र का पानी गांवों को डुबो देगा."

कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में समुद्र विज्ञान संस्थान के निदेशक और सुंदरबन पर जलवायु परिवर्तन के असर पर लंबे अर्से से शोध करने वाले डॉक्टर सुगत हाजरा कहते हैं, "तूफ़ान ने इलाके में आधारभूत ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है. इसका लोगों की आजीविका पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ेगा. आने वाले महीनों में इलाके से बड़े पैमाने पर विस्थापन देखने को मिलेगा. आइला के बाद अब तक जो कुछ भी दोबोरा बना था, वह सब साफ हो गया है."

वो कहते हैं कि सुंदरबन डेल्टा में समुद्र के जलस्तर में वृद्धि की दर औसत वैश्विक दर से काफी ऊंची है.

कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में समुद्र विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. सुगत हाजरा

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'कोलकाता के कवच' को भी पहुंचा नुक़सान

अंफन से इलाके के मैंग्रोव जंगल और जैविक विविधता को भी भारी नुकसान पहुंचा है.

राज्य के चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन रविकांत सिन्हा कहते हैं, "अंफन से लगभग 15 सौ वर्ग किलोमीटर इलाके में जंगल को भारी नुकसान पहुंचा है. इसके साथ ही बाघों को इंसानी बस्तियों में घुसने से बचाने के लिए नायलन की जो जाली लगाई गई थी वह भी तहस-नहस हो चुकी है."

वह बताते हैं कि विभाग ने मोटर बोटों के जरिए लगभग 70 फीसदी इलाके़ का निरीक्षण किया है. इसके अलावा नुकसान के आकलन के लिए ड्रोनों की सहायता भी ली गई है. इससे बर्बादी की बेहद भयावह तस्वीर सामने आई है.

पर्यावरणविद् डॉक्टर सुगत हाजरा बताते हैं, "किसी तूफ़ान की स्थिति में मैंग्रोव के जंगल हवा की रफ़्तार को कम कर देते हैं. इससे तूफ़ान की गति और उससे होने वाली क्षति काफी कम हो जाती है. इस इलाक़े को कोलकाता का कवच कहा जाता है जो अक्सर उसे ऐसे चक्रवाती तूफानों से बचाता रहा है. इसने वर्ष 2009 में आइला और बीते साल बुलबुल के कहर से भी कोलकाता की रक्षा की थी. लेकिन अब इसका बड़ा हिस्सा बर्बाद हो गया है."

सुंदरबन का घोड़ामारा द्वीप जलवायु परिवर्तन की वजह से धीरे-धीरे बंगाल की खाड़ी में समाने की वजह से अक्सर सुर्खियां बटोरता रहा है.

कभी 130 वर्ग किलोमीटर में फैला यह द्वीप अब सिकुड़ कर महज़ 25 वर्ग किलोमीटर रह गया है. यहां लगभग छह हज़ार लोग रहते हैं. लेकिन तूफ़ान के बाद यहां एक भी मकान साबूत नहीं बचा है.

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खारे पानी के कारण कृषि होगी मुश्किल

कुलतली के विधायक रामशंकर हालदार बताते हैं, "इलाके में बांधों को काफी नुकसान पहुंचा है. बारिश का सीज़न सिर पर है. ऐसे में बांधों की युद्धस्तर पर मरम्मत ज़रूरी है. उन्होंने सरकार से यह काम शीघ्र शुरू करने की अपील की है."

दक्षिण 24-परगना के ज़िलाधिकारी पी. उलंगनाथन बताते हैं, "अंफन से इलाके में नदियों पर बने 140 किलोमीटर लंबे बांध को भारी नुकसान हुआ है. सरकार 100 दिनों के काम योजना के तहत शीघ्र इसे बनाने का काम शुरू करेगी ताकि ज्वार-भाटे के समय पानी गांवों में नहीं घुस सके."

आइला के बाद इलाके के तालाबों और खेतों में समुद्र का खारा पानी भर जाने की वजह से तीन साल तक खेती नहीं हो सकी थी.

लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अबकी इसमें कम से कम पांच साल का समय लग सकता है. और वह भी तब जबकि इलाक़े के लोगों के जीवन को पटरी में लाने के लिए बड़े पैमाने पर राहत और पुनर्वास का काम शुरू हो.

अभी तो कई इलाकों तक पर्याप्त राहत तक नहीं पहुंच सकी है. इलाके के कई ब्लाकों में स्थानीय लोगों के हित में काम करने वाले एक गै़र-सरकारी संगठन के प्रमुख शंकर हालदार कहते हैं, "यहां के लोग पहले से ही काफी हद तक गैर-सरकारी संगठनों और सरकार की सहायता पर निर्भर थे. लेकिन यह तूफ़ान उनके लिए ताबूत की आख़िरी कील साबित हो सकता है."

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