बांग्लादेश‑पाकिस्तान की बढ़ती दोस्ती क्या भारत के लिए चिंता की बात है?

    • Author, शुभज्योति घोष
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला
    • ........से, नई दिल्ली
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान ने पद संभालने के क़रीब चार महीने बाद अपनी पहली विदेश यात्रा पूरी करके देश वापसी की है.

उन्होंने सबसे पहले मलेशिया का दौरा किया. इसके बाद वे चीन गए. वहां उन्होंने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भी मुलाकात की.

इससे पहले काफ़ी अटकल लगाई जा रही थी कि तारिक़ रहमान पहली विदेश यात्रा भारत में करेंगे या फ़िर चीन और सऊदी अरब जैसे किसी देश में. लेकिन अंत में उन्होंने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को न चुनने का निर्णय लिया.

इत्तेफ़ाक से इस यात्रा से कुछ दिन पहले ही भारत के नए उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी बांग्लादेश पहुंचे. वे जमीनी रास्ते से सीमा पार करके ढाका गए.

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

बांग्लादेश की नई सरकार और भारत से संबंध

भारत और बांग्लादेश के बीच क़रीब 55 साल के राजनयिक संबंधों में पहली बार भारत ने किसी राजनीतिक व्यक्ति को ढाका में अपना प्रतिनिधि बनाया है. इसलिए यह कदम अपने आप में ऐतिहासिक माना जा रहा है.

ढाका पहुंचने के तुरंत बाद उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने भूपेन हजारिका के एक लोकप्रिय गीत का हवाला दिया. इसमें यह विचार बताया गया कि दोनों देशों का "आसमान एक है और हवा भी एक है".

उनकी इस टिप्पणी पर बांग्लादेश में तीखी प्रतिक्रिया हुई. कई लोगों को लगा कि यह "अखंड भारत" के विवादित विचार को बढ़ावा देने जैसा है.

इसी समय दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव भी बढ़ गया है. यह विवाद इस आरोप को लेकर है कि भारत, लोगों को जबरन सीमा पार करके बांग्लादेश भेज रहा है. इस तरह की कार्रवाई को "पुश-बैक" या "पुश-इन" कहा जाता है.

इस मुद्दे पर हाल ही में दिल्ली में दोनों देशों की सीमा बलों के बीच एक उच्च स्तर की बैठक हुई. लेकिन इस बैठक से कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया.

दोनों देशों के रिश्ते इतने ख़राब हो गए हैं कि बांग्लादेश के एक वरिष्ठ राजनयिक ने बीबीसी से कहा, "विदेश मंत्री खलीलुर रहमान की दिल्ली यात्रा के बाद लग रहा था कि रिश्ते फिर सामान्य हो रहे हैं. लेकिन अब वह उम्मीद लगभग ख़त्म हो गई है. रिश्ते तेजी से गिर रहे हैं और जो उपलब्धियां मेहनत से हासिल की गई थीं, वे एक-एक करके ख़त्म होती जा रही हैं."

निजी बातचीत में बांग्लादेश के अधिकारी इस नई गिरावट के लिए भारत के बीजेपी शासित दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों के आक्रामक रुख को जिम्मेदार मानते हैं. इनमें असम के हिमंता बिस्वा सरमा और पश्चिम बंगाल के शुभेंदु अधिकारी शामिल हैं.

बांग्लादेश को ख़ासतौर पर उनके उन बयानों पर कड़ा एतराज है, जिनमें कथित बांग्लादेशी नागरिकों को जबरन सीमा पार भेजने की बात कही गई. बांग्लादेश इसे उकसाने वाला और भड़काऊ मानता है.

पाकिस्तान से बांग्लादेश की करीब़ी और भारत

ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारी भी यह नहीं कह रहे हैं कि रिश्ते ख़राब नहीं हुए हैं. वे मानते हैं कि हालात फिर बिगड़े हैं.

लेकिन वे इसका जिम्मा पूरी तरह बांग्लादेश पर डालते हैं. उनका कहना है कि ढाका पाकिस्तान के साथ अपने संबंध मजबूत करना चाहता है. वह एक तरह का "रणनीतिक रिश्ता" बना रहा है.

भारतीय अधिकारियों के मुताबिक़, यही दोनों देशों के रिश्तों में गिरावट की सबसे बड़ी वजह है.

5 अगस्त, 2024 को शेख़ हसीना की सरकार गिरने के बाद बांग्लादेश और पाकिस्तान तेजी से करीब आए. यह बदलाव प्रोफ़ेसर मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान साफ दिखा.

इस दौरान पाकिस्तान के कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी बार-बार बांग्लादेश आए. साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए कई नई पहल शुरू की गईं.

दिल्ली में मौजूद भारतीय अधिकारियों ने बीबीसी से कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि जब तारिक़ रहमान की अगुवाई में राजनीतिक सरकार बनेगी तो बांग्लादेश पाकिस्तान से अपनी बढ़ती नज़दीकी कम करेगा.

उनके हिसाब से ऐसा नहीं हुआ जिससे भारत को निराशा हुई.

यह निराशा इतनी ज़्यादा थी कि भारत ने बांग्लादेश से यह अनुरोध भी नहीं किया कि तारिक़ रहमान अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा के लिए भारत आएं.

इसके बजाय भारत का रुख काफी ठंडा दिखा. उसने साफ़ संकेत दिया कि तारिक़ रहमान के भारत आने या न आने से कोई ज्यादा फ़र्क नहीं पड़ता.

लेकिन फिर भी एक अहम सवाल बना हुआ है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच जो नज़दीकी दिख रही है, उसमें असली मजबूती कितनी है? भारत इसी को दोनों देशों के रिश्तों में गिरावट की वजह मानता है.

और यह भी सवाल है कि इसमें कितना हिस्सा सिर्फ दिखावे का है. यानी क्या यह सिर्फ एक खास तरह की छवि दिखाने की कोशिश है.

यह रिपोर्ट इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करती है.

क्या पाकिस्तान का प्रभाव सच में बढ़ रहा है?

रीवा गांगुली दास पांच साल पहले तक बांग्लादेश में भारत की उच्चायुक्त थीं. वह एक अनुभवी भारतीय राजनयिक हैं.

उनका मानना है कि बांग्लादेश में हाल के समय में इस्लामी समूहों का बढ़ना एक बड़ा बदलाव है. उनका कहना है कि कुछ साल पहले ऐसे हालात नहीं थे.

उन्होंने कहा, "हाल ही में बांग्लादेश आज़ाद पार्टी नाम के एक छोटे संगठन ने कुछ इस्लामी समूहों के साथ मिलकर ढाका में भारतीय उच्चायोग के बाहर बड़ा प्रदर्शन किया. इससे सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा हो गई."

उन्होंने आगे कहा, "मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी की मदद के बिना हो सकता है. आईएसआई साफ़तौर पर बांग्लादेश में अपनी पुरानी पकड़ दोबारा मजबूत करने की कोशिश कर रही है."

रीवा दास का मानना है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकी की चर्चा में काफ़ी हद तक सच्चाई है. उनके मुताबिक़, भारत के लिए चिंतित होने की पर्याप्त वजह है.

वह बिना किसी हिचकिचाहट के यह कहती हैं कि बांग्लादेश एक बार फिर इस्लामी ताकतों के पनपने की जगह बन गया है. उनके मुताबिक़, इसमें पाकिस्तान का मौन समर्थन भी शामिल है.

बांग्लादेश में पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों की यात्राओं या ऐसे ही घटनाक्रमों को लेकर बीते दो सालों के दौरान भारतीय विदेश मंत्रालय से जब भी सवाल किया गया, तो उसके प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने लगभग एक जैसा जवाब दिया है.

उन्होंने कहा, "हम क्षेत्र में अपने रणनीतिक हितों को प्रभावित करने वाली हर गतिविधि पर नज़र रखते हैं."

निजी बातचीत में भारत के वरिष्ठ अधिकारी भी यही कहते हैं कि बांग्लादेश में पाकिस्तान की गतिविधियां उनकी नजर में हैं.

उनका कहना है कि पाकिस्तान की ख़ुफिया एजेंसी का पहले बांग्लादेश की सेना, प्रशासन और सरकारी संस्थानों पर काफ़ी असर था. अब वह किसी भी कीमत पर उस प्रभाव को फिर से हासिल करना चाहती है.

साथ ही, भारतीय अधिकारियों का यह भी मानना है कि पिछले दो वर्षों में पाकिस्तान ने बांग्लादेश के साथ संबंध मजबूत करने की जो कोशिश की है, उसका ध्यान सैन्य सहयोग पर कम है.

उनके मुताबिक़, ज़्यादा जोर सांस्कृतिक जुड़ाव पर दिया जा रहा है.

एक अधिकारी ने कहा, "हमारा आकलन है कि कई कारणों के चलते बांग्लादेश और पाकिस्तान रक्षा सहयोग को बहुत तेजी से ऊंचे स्तर पर नहीं ले जा सकते. इस संबंध की एक सीमा है."

उन्होंने आगे कहा, "इसलिए वे शिक्षा, संस्कृति और व्यापार जैसे क्षेत्रों पर ध्यान दे रहे हैं. इनके ज़रिए वे नए संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं."

उन्होंने उदाहरण के तौर पर बताया कि बांग्लादेश के प्रमुख तकनीकी संस्थानों में से एक सिलहट स्थित शाहज़लाल यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में पाकिस्तान ने दो छात्रवृत्तियां शुरू करने का फैसला किया है.

उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लादेश के शिक्षा मंत्री पाकिस्तान गए थे. वहां उन्होंने पाकिस्तान की उच्च शिक्षा प्रणाली की तारीफ़ की और बांग्लादेशी विद्यार्थियों को वहां पढ़ाई करने के लिए प्रोत्साहित किया.

इसी तरह, ढाका और कराची के बीच सीधी उड़ान शुरू करने की योजना भी घोषित की गई है.

भारत का कहना है कि इस रूट के लिए यात्रियों की मांग बहुत कम है. इसलिए वह मानता है कि यह क़दम राजनीतिक संदेश देने के लिए ज़्यादा उठाया गया है.

'मुक्ति संग्राम के आदर्श अभी वापस नहीं लौटे हैं'.

भारत के नीति-निर्माण से जुड़े कई लोग आज भी बांग्लादेश के साथ रिश्तों को 1971 के मुक्ति संग्राम के नज़रिए से देखते हैं.

उनका मानना है कि उस इतिहास की वजह से ढाका और इस्लामाबाद के बीच सामान्य और सच्ची दोस्ती संभव नहीं है.

लेकिन जब पिछले साल अगस्त में पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इसहाक़ डार ढाका पहुंचे तो उन्होंने एक अलग संदेश दिया. उन्होंने कहा कि दोनों देशों की नई पीढ़ी एक "साझा सपना" अपनाने के लिए तैयार हैं.

इसहाक़ डार ने उस समय कहा, "कराची से चटगांव, क्वेटा से राजशाही, पेशावर से सिलहट और लाहौर से ढाका तक, हमारे युवा एक साथ खड़े होने और हर चुनौती का मिलकर सामना करने के लिए तैयार हैं." यह बयान उन्होंने उस समय के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस से मुलाक़ात के बाद दिया.

भारत को उम्मीद थी कि बीएनपी की सरकार आने के बाद पाकिस्तान से बढ़ती नज़दीकी कम होगी. लेकिन उसका कहना है कि ऐसा नहीं हुआ.

भारत की सत्तारूढ़ बीजेपी के क़रीब माने जाने वाले विदेशी नीति के जानकार शुभ्रकमल दत्ता कहते हैं, "प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान ख़ुद एक सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी के बेटे हैं. हमें उम्मीद थी कि वे नीतियों में बदलाव करेंगे."

उन्होंने आगे कहा, "लेकिन सौ दिन से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद भी ऐसा कोई संकेत नहीं मिला. अंतरिम सरकार के जैसे ही अब भी पाकिस्तान के समर्थक और इस्लामी समूह राजनीति और सार्वजनिक जीवन में प्रभावी हैं."

डॉ. दत्ता का यह भी कहना है कि 1971 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान की सेना ने कई महिलाओं के खिलाफ भयानक अत्याचार किए थे. और उसने कभी औपचारिक रूप से माफ़ी नहीं मांगी.

उनके अनुसार, बांग्लादेश के लोगों के मन का ग़ुस्सा इतनी जल्दी ख़त्म नहीं हो सकता.

उन्होंने कहा, "इसी वजह से मुझे लगता है कि अगर बीएनपी पाकिस्तान से नज़दीकी दिखाने की कोशिश करती है, तो इसका उल्टा असर होगा. अंत में बीएनपी को समझ आएगा कि पाकिस्तान उसका सच्चा दोस्त नहीं है, लेकिन शायद तब तक उसे भारी कीमत चुकानी पड़े."

कई भारतीय विश्लेषकों का मानना है कि कोई राजनीतिक ताक़त अगर बांग्लादेश में पाकिस्तान की स्वाभाविक सहयोगी मानी जा सकती है, तो वह जमात-ए-इस्लामी है. जो इस समय देश की मुख्य विपक्षी पार्टी है.

बांग्लादेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले एक पूर्व भारतीय राजदूत ने कहा, "अगर पाकिस्तान किसी का समर्थन करेगा तो अपनी सबसे भरोसेमंद ए टीम का करेगा, वह बी टीम को क्यों चुनेगा?"

उन्होंने यह भी कहा, "अगर बी-टीम यह बात नहीं समझेगी और पाकिस्तान के इशारे पर चलेगी तो एक दिन जमात-ए-इस्लामी, बीएनपी को निगल जाएगी. "

इसलिए इसमें बहुत ज़्यादा संदेह नहीं है कि बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति पर पाकिस्तान की छाया अब एक अहम हक़ीक़त बनती जा रही है.

अब भारत क्या करे?

भारत का बांग्लादेश की कूटनीति, व्यापार और अर्थव्यवस्था में अब भी बड़ा प्रभाव है. ऐसे में सवाल उठता है कि ढाका, पाकिस्तान के ज्यादा क़रीब दिखकर नई दिल्ली को नाराज़ क्यों करना चाहेगा?

बांग्लादेश सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी से कहा कि बांग्लादेश भी मानता है कि उसे भारत के साथ पाकिस्तान की तुलना में कहीं मजबूत संबंध चाहिए.

लेकिन उनका कहना है कि भारत की घरेलू राजनीति की मजबूरियां रिश्तों को दूसरी दिशा में ले जा रही हैं.

उन्होंने यह भी बताया कि तारिक़ रहमान की सरकार बनने के कुछ समय बाद दो प्रभावशाली लेफ्टिनेंट जनरलों का तबादला कर दिया गया.

इन अधिकारियों को पाकिस्तान के करीब माना जाता था. उन्हें अहम पदों से हटाकर विदेश मंत्रालय में कम महत्वपूर्ण भूमिकाओं में भेज दिया गया.

ये दोनों अधिकारी 2025 में पाकिस्तान गए थे. वहां उन्होंने पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर से भी मुलाक़ात की थी.

अधिकारी ने कहा, "लेकिन ऐसे कदमों का सकारात्मक जवाब देने के बजाय हमने देखा कि हिमंता बिस्वा सरमा और शुभेंदु अधिकारी, लोगों को जबरन सीमा पार भेजने की बात कर रहे थे. इससे रिश्ते फिर बिगड़ गए."

कई जानकार मानते हैं कि भारत की घरेलू राजनीति का असर उसकी विदेश नीति पर पड़ता है. फिर भी उनका कहना है कि बांग्लादेश के मामले में भारत को पाकिस्तान के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा फायदे हैं.

लंदन के भू-राजनीतिक विश्लेषक प्रियजीत देबसरकार कहते हैं, "पश्चिम एशिया संकट के दौरान अतिरिक्त ऊर्जा आपूर्ति हो या कोविड महामारी के समय वैक्सीन, हर बार भारत ने बांग्लादेश की मदद की है न कि पाकिस्तान ने. इसलिए ढाका और इस्लामाबाद के बीच मौजूदा नज़दीकी हैरान करने वाली लगती है."

उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान खुद आर्थिक और व्यापारिक कठिनाइयों से जूझ रहा है. ऐसे में यह सवाल उठता है कि वह बांग्लादेश की कितनी मदद कर सकता है?

उनके अनुसार, पाकिस्तान अपने ख़ास सहयोगी चीन के साथ भी पहले जैसा मजबूत प्रभाव नहीं रखता.

इसी वजह से कई विश्लेषकों का मानना है कि अगर भारत उकसावे वाली बातों पर प्रतिक्रिया देने से बचे और बांग्लादेश के प्रति संतुलित और दोस्ताना नीति अपनाए, तो ढाका धीरे-धीरे ख़ुद ही पाकिस्तान से दूरी बना सकता है.

दिल्ली के मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन संस्थान की वरिष्ठ शोधकर्ता स्मृति पट्टनाइक कहती हैं कि भारत को सैद्धांतिक रूप से बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच सांस्कृतिक, आर्थिक या व्यापारिक संबंध बढ़ने पर कोई आपत्ति नहीं है.

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि ऐसे संबंध बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति को स्थिर करने में मदद कर सकते हैं.

लेकिन उन्होंने चेतावनी दी, "अगर दिल्ली को लगता है कि ये गतिविधियां भारत के रणनीतिक हितों को नुक़सान पहुंचा रही हैं, या यह सहयोग संवेदनशील क्षेत्रों तक फैल रहा है, तो भारत निश्चित रूप से इसे रोकने की कोशिश करेगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)