अमेरिका-ईरान डील इसराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के लिए कैसे बनी बुरा सपना?

    • Author, लूसी विलियम्सन
    • पदनाम, मध्य-पूर्व संवाददाता
    • ........से, Jerusalem
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

ईरान के साथ अमेरिका का युद्धविराम समझौता इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के लिए राजनीतिक तौर पर एक बुरे सपने की तरह हो गया है.

इस समझौते ने नेतन्याहू के राजनीतिक करियर के तीन मज़बूत आधारों को तोड़ दिया है और देश की सुरक्षा को लेकर उन्हें एक नई दुविधा में फंसा दिया है.

जिस शख़्स ने ख़ुद को अमेरिका का एक राजनीतिक क़रीबी और अमेरिकी राजनेताओं पर वास्तविक प्रभाव रखने वाला बताया हो, उसे अमेरिका ने व्यापक रूप से दरकिनार कर दिया और उनका सार्वजनिक रूप से अपमान भी किया.

जिस शख़्स ने ईरान मुद्दे को इसराइल की सुरक्षा के लिए सबसे अहम बना दिया, वह ईरान के साथ युद्ध को एक ऐसे मोड़ पर कैसे ख़त्म कर सकता है, जिसमें ईरान मज़बूत स्थिति में दिख रहा हो?

कुछ ही महीनों में इसराइल में आम चुनाव होने हैं. अमेरिका और ईरान की मांग है कि इसराइल लेबनान में हिज़्बुल्लाह पर हमला करना बंद कर दे. ऐसी मांग से इसराइल के 'मिस्टर सिक्योरिटी' के रूप में नेतन्याहू की पुरानी, ​​​​दाग़दार राजनीतिक छवि कैसे बच सकती है?

नेतन्याहू पर बढ़ता दबाव

नेतन्याहू के सामने अब जो रास्ते बचे हैं, वे उनके लिए बहुत अच्छे नहीं हैं.

सोमवार को ईसराइली संसद कनेसेट में विपक्षी नेता याएर लैपिड ने नेतन्याहू के सामने बचे विकल्पों के बारे में कुछ इस तरह बताया, "या तो हमारे सबसे बड़े साथी (अमेरिका) के साथ सीधी और हमें नुक़सान पहुंचाने वाली टक्कर हो, या फिर इसराइली हितों के साथ समझौता कर लिया जाए."

इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू को फटकार लगाते हुए कहा था कि बीते दिनों बेरूत पर हमले का आदेश देते समय उन्होंने कोई समझदारी नहीं दिखाई.

शॉर्ट वीडियो देखिए

नेतन्याहू के राजीनितिक दुश्मनों और मीडिया कमेंटेटर्स ने इस पर ख़ास ध्यान दिया है, जो पहले से ही अक्तूबर में होने वाले चुनाव पर फोकस कर रहे हैं.

नेतन्याहू की अपनी लिकुड पार्टी के सदस्यों और सरकार में उनके गठबंधन में मौजूद कट्टर दक्षिणपंथी कैबिनेट मंत्रियों के बयानों से भी पता चलता है कि उन पर कितना दबाव है.

यह दबाव सबसे ज़्यादा ईरान की इस मांग को लेकर है कि सीज़फ़ायर समझौते में "लेबनान समेत सभी मोर्चों पर मिलिट्री ऑपरेशन" बंद होना शामिल हो.

इसराइल के कट्टर दक्षिणपंथी नेता नेशनल सिक्योरिटी मिनिस्टर, इतामार बेन-ग्विर ने सोमवार को सोशल मीडिया पर लिखा, "हम ट्रंप के समझौते से बंधे नहीं है. हम इस समझौते के साझेदार नहीं हैं जो हमारी सुरक्षा पक्का नहीं करता."

कट्टरपंथियों के निशाने पर नेतन्याहू

लिकुड पार्टी के सांसद एरियल कल्नर ने मुझसे कहा, "इसराइल अपनी सुरक्षा करता रहेगा."

हालांकि उन्होंने यह साफ़ नहीं किया कि क्या इसका मतलब यह है कि इसराइल अपने हमले जारी रखेगा.

उन्होंने कहा, "हम वही करेंगे जो ज़रूरी है. और हमें उम्मीद है कि हमारे दोस्त हमें समझेंगे. कभी-कभी सहयोगियों के बीच मतभेद होते हैं, और जब एक सहयोगी ख़तरे में हो तो दूसरे सहयोगियों को बात समझनी चाहिए."

मोसाद की पूर्व अधिकारी और ईरान मामलों की जानकार सीमा शाइन ने कहा, "यह समझना मुश्किल है कि अमेरिकियों ने इसे क्यों माना."

"लेबनान में क्या होगा, यह तय करने की छूट ईरान को देकर, अमेरिका ईरान को हिज़्बुल्लाह का समर्थन जारी रखने और यह पक्का करने का मौका दे रहा है कि हिज़्बुल्लाह लेबनान की राजनीति में एक अहम ताक़त बना रहे."

उन्होंने कहा, "इसराइल इससे खुश नहीं है, न तो सुरक्षा से जुड़े अधिकारी और न ही राजनेता."

थोड़ी देर पहले बिन्यामिन नेतन्याहू ने सोशल मीडिया एक्स पर एक वीडियो पोस्ट किया है.

इसमें उन्होंने कहा, "समझौते के साथ या इसके बिना, जब तक मैं इसराइल का प्रधानमंत्री हूं तब तक ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होगा."

दशकों से नेतन्याहू मतदाताओं के सामने सुरक्षा का मुद्दा ही मुख्य रूप से रखते आए हैं. अब इस बात को लोगों तक पहुँचाना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है.

7 अक्तूबर 2023 को हमास के भयानक हमलों के जवाब में उन्होंने इसराइल की सुरक्षा नीति को ज़्यादा आक्रामक रुख़ की ओर मोड़ा. यानी ख़तरों को रोकने के बजाय उन्हें पहले ही उसे ख़त्म करने की कोशिश की.

उस संकट का उनका समाधान था-इसराइल के सामने मौजूद ख़तरों को ख़त्म करके मध्य-पूर्व में बदलाव लाना.

लेकिन हमास के संचालन वाले स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इसराइली सेना ने भले ही ग़ज़ा के बड़े हिस्से को तबाह कर दिया हो और 73,000 से ज़्यादा लोगों को मार डाला हो, फिर भी हमास का आधे इलाक़े पर कब्ज़ा है और वह वहाँ अपनी ताकत फिर से बढ़ा रहा है.

वहीं, इसराइल और हमास के बीच युद्धविराम समझौते के आठ महीने बाद भी, अमेरिका की मध्यस्थता वाली शांति योजना और ग़ज़ा के लिए अमेरिका की ओर से नियुक्त प्रशासन का मामला अधर में लटका हुआ है.

ईरान का नया नेतृत्व ज़्यादा आक्रामक

सुरक्षा को लेकर नेतन्याहू के नए नज़रिए की वजह से इसराइली सेनाएँ ग़ज़ा, लेबनान और सीरिया के बड़े इलाक़ों पर कब्ज़ा किए हुए हैं.

बहुत से इसराइली इसे पसंद करते हैं और चुनाव से पहले इसके ख़त्म होने की संभावना भी कम है, लेकिन इससे इसराइल के सैन्य संसाधनों और रिज़र्व सैनिकों पर बहुत ज़्यादा दबाव पड़ रहा है.

इससे निकलने का कोई साफ़ कूटनीतिक रास्ता भी नहीं दिख रहा है.

हिज़्बुल्लाह और ईरानी सरकार के साथ बार-बार हुए टकराव से इसराइल के मुख्य दुश्मन ख़त्म नहीं हुए हैं, बल्कि ईरान में अब ज़्यादा कट्टरपंथी नेताओं का दबदबा हो गया है.

ईरान के इन नेताओं को अमेरिका-इसराइल की ताक़त का कम डर है और होर्मुज़ स्ट्रेट के सहारे उन्हें ज़्यादा बढ़त भी हासिल है.

इसराइल के 'इंस्टीट्यूट फ़ॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज़' (आईएनएसएस) में ईरान मामलों के सीनियर रिसर्चर डैनी सिट्रिनोविच का कहना है, "इसराइल की नाकामी के कारण ईरान के प्रति उसकी रणनीति का नए सिरे से आकलन करने की ज़रूरत है. उसे ज़्यादा व्यावहारिक और संयमित प्राथमिकताएँ तय करनी होंगी."

उन्होंने दैनिक अख़बार 'इसराइल हायोम' के लिए लिखे एक लेख में कहा, "अगर अमेरिका को इसराइल का कोई सैन्य कदम समझौते को कमज़ोर करने की कोशिश जैसा लगा, तो उम्मीद है कि अमेरिका की तरफ़ से सख़्त प्रतिक्रिया होगी."

उन्होंने लिखा है, "ओबामा प्रशासन के दौर में बिन्यामिन नेतन्याहू कांग्रेस और अमेरिकी जनता का समर्थन जुटाकर व्हाइट हाउस को दरकिनार करने की कोशिश कर सकते थे, लेकिन इसके विपरीत आज के समय में ऐसे विकल्प लगभग न के बराबर हैं."

इसराइली मतदाताओं के सामने नेतन्याहू का तर्क लंबे समय से यही रहा है कि उनकी नीतियाँ और राजनीतिक कौशल क्षेत्रीय ख़तरों से सबसे अच्छी सुरक्षा देते हैं. लेकिन लगता है कि इस घटनाक्रम (अमेरिका-ईरान समझौता) ने उनके इस वादे को पीछे छोड़ दिया है.

ईरान में सत्ता परिवर्तन से शायद उनकी राजनीतिक छवि और चुनावी नैरेटिव को बचाया जा सकता था.

इसके बजाय, सुरक्षा को लेकर उनके नए नज़रिए ने उन्हें टकराव या आत्मसमर्पण में से किसी एक को चुनने की स्थिति में ला खड़ा किया है - और यह टकराव किसी दुश्मन से नहीं, बल्कि एक सहयोगी से है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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