वैभव सूर्यवंशी सिर्फ क्रिकेट नहीं बल्कि बिहार को एक नई पहचान कैसे दे रहे हैं

    • Author, नीरज झा
    • पदनाम, बिजनेस हेड, यूरोस्पोर्ट, बीबीसी हिन्दी के लिए
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(नोट: ये लेखक के निजी विचार हैं)

कुछ साल पहले तक जब भी मैं दिल्ली में अपने दोस्तों को बताता था कि मैंने पटना जिले के लिए कॉम्पिटिटिव क्रिकेट खेला है, तो उनके चेहरे पर एक मुस्कान आ जाती थी.

यह तारीफ वाली मुस्कान नहीं होती थी, बल्कि मजाक वाली मुस्कान होती थी. सोच साफ थी: बिहार और क्रिकेट का एक ही लाइन में जिक्र होना अजीब लगता था. दशकों से बिहार के स्पोर्ट्स की सच्चाई यही रही है.

बिहार 13 करोड़ से ज्यादा आबादी वाला राज्य है. एक ऐसा राज्य जिसने स्कॉलर, ऑफिसर्स, बिजनेसमैन और नेता दिए हैं. एक ऐसा राज्य जिसके लोगों ने पूरे भारत और दुनिया भर में अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में मदद की है. लेकिन स्पोर्ट्स की बात करें तो बिहार का नाम कहीं नहीं दिखता था.

लेकिन अब ये सब बदल रहा है. हैरानी की बात यह है कि इस बदलाव का चेहरा समस्तीपुर का एक टीनएजर है. यह नाम याद रखिएगा, वैभव सूर्यवंशी.

यह सिर्फ एक टैलेंटेड क्रिकेटर की कहानी नहीं है. यह कहानी है कि कैसे एक युवा लड़के ने पूरे राज्य के बारे में लोगों की सोच बदलना शुरू कर दिया है.

बिहार क्रिकेट की बड़ी त्रासदी

बिहार क्रिकेट की त्रासदी कभी भी टैलेंट की कमी नहीं थी. त्रासदी तो मौकों की कमी और भ्रष्टाचार थी. सालों तक बिहार के उभरते हुए क्रिकेटरों को ऐसे माहौल का सामना करना पड़ा जो दूसरे राज्यों के मुकाबले टिक नहीं सकता था.

इंफ्रास्ट्रक्चर खराब था. एडमिनिस्ट्रेशन में अनिश्चितता बनी हुई थी. प्रोफेशनल रास्ते सीमित थे.

इसका सबसे मशहूर उदाहरण महेंद्र सिंह धोनी हैं. धोनी का परिवार मूल रूप से बिहार का था. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था.

नवंबर 2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड बनने के बाद रांची नए राज्य का हिस्सा बन गया. इसके चलते बिहार लंबे समय तक मुख्य घरेलू क्रिकेट ढांचे से बाहर रहा. इस वजह से हालात और बिगड़ गए.

नतीजा पहले से ही पता था. धोनी ने झारखंड राज्य से भारत के लिए जर्सी पहनी. टैलेंटेड क्रिकेटर ज्यादातर दूसरी जगहों पर मौके तलाशने लगे. ईशान किशन ने भी यही रास्ता अपनाया. अनगिनत दूसरे खिलाड़ियों ने भी ऐसा ही किया.

सालों तक बिहार टैलेंट डेस्टिनेशन बनने के बजाय टैलेंट एक्सपोर्टर बन गया. अजीब बात यह है कि बिहार का हर शख्स फिर भी इन स्टार्स को अपना ही मानता था. क्योंकि अंदर ही अंदर लोग जानते थे कि समस्या कभी टैलेंट की नहीं थी. समस्या तो सिस्टम की थी.

वह राज्य जिसने सब कुछ एक्सपोर्ट किया

कई दशकों तक बिहार ने लोगों को वर्कर, इंजीनियर, डॉक्टर, टीचर, सिविल सर्वेंट और राजनेता के तौर पर राज्य से बाहर भेजा.

अगर कोई एक ऐसा क्षेत्र था जहां बिहार ने लगातार राष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक पहचान बनाई तो वो था यूपीएससी परीक्षा पास करके आईएएस और आईपीएस बनने वाले युवा पुरुषों और महिलाओं की संख्या.

बिहार महत्वाकांक्षा और हिम्मत की पहचान बन गया. लेकिन खेल में बेहतरीन प्रदर्शन के मामले में ऐसा नहीं था.

बिहार के बाहर राज्य की छवि अक्सर पलायन के आंकड़ों, राजनीतिक सुर्खियों और रूढ़िवादी धारणाओं से बनती थी. राज्य के बाहर रहने वाले बिहार के लोग अच्छी तरह समझते हैं कि मेरा क्या मतलब है.

हमने अपनी पहचान को सावधानी से संभालना सीखा. हमें बिहार से होने पर गर्व था. लेकिन हम उस पहचान से जुड़ी रूढ़िवादी धारणाओं को भी जानते थे.

क्रिकेट के दीवाने देश में जहां मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और रांची से कई दिग्गज खिलाड़ी निकले हैं, देश के एक ऐसे कोने से एक नया नाम उभर रहा है जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी.

बिहार के समस्तीपुर जिले के ताजपुर के रहने वाले किशोर वैभव सूर्यवंशी तेजी से दुनिया के सबसे चर्चित युवा क्रिकेटरों में से एक बन गए हैं.

उस उम्र में जब अधिकतर बच्चे स्कूल की परीक्षाओं पर ध्यान देते हैं, सूर्यवंशी रिकॉर्ड बुक को नए सिरे से लिख रहे हैं. वह अनुभवी इंटरनेशनल गेंदबाजों को अपनी रणनीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं.

'खेल से दिया जवाब'

वैभव के आगे बढ़ने की कहानी सिर्फ आंकड़ों से पूरी तरह बयां नहीं होती. 13 साल की उम्र में वह आईपीएल कॉन्ट्रैक्ट पाने वाले सबसे युवा खिलाड़ी बने. उन्हें राजस्थान रॉयल्स ने 1.1 करोड़ रुपये में साइन किया.

एक साल बाद वह पुरुषों के टी20 इतिहास में सबसे कम उम्र में शतक लगाने वाले खिलाड़ी बने. उन्होंने 35 गेंदों में शतक बनाया, जो आईपीएल के इतिहास में किसी भारतीय का सबसे तेज शतक है.

आईपीएल 2025 के दौरान उन्होंने सात मैचों में 207 के स्ट्राइक रेट से 252 रन बनाए. इसके बाद उन्होंने 2026 अंडर-19 वर्ल्ड कप फाइनल में 80 गेंदों पर 175 रन बनाकर दबदबा कायम किया. साथ ही लिस्ट ए क्रिकेट में सबसे तेज 150 रन बनाने का एबी डिविलियर्स का रिकॉर्ड तोड़ा.

लेकिन आईपीएल 2026 ने सब कुछ बदल दिया. 16 मैचों में उनके बनाए 776 रन. ये आईपीएल इतिहास में किसी अनकैप्ड खिलाड़ी की ओर से बनाए गए सबसे ज़्यादा रन थे. ये बात अपने आप में आसाधरण थी.

72 छक्के तो और भी कमाल के थे. विरोधी टीमों के कप्तान जो कभी उन पर शुरुआत में ही अटैक करने की योजना बनाते थे, मैच से पहले की मीटिंग्स में यह सोचने लगे कि नुकसान को कैसे कम किया जाए.

एलिमिनेटर में 29 गेंदों पर उनके 97 रन, जिसमें 12 छक्के शामिल थे, ऐसी पारी थी जिसने अनुभवी ब्रॉडकास्टर्स को ऐसे शब्द इस्तेमाल करने पर मजबूर कर दिया जो वे आम तौर पर नहीं करते.

आंकड़े जिस बात को नहीं दिखा सकते, वह है उनका निडर अंदाज. वर्ल्ड-क्लास गेंदबाजों के खिलाफ पहली ही गेंद पर छक्का लगाना उनकी पहचान बन गई है. यह कोई दिखावा नहीं, बल्कि उनका स्वाभाविक अंदाज है. 15 साल की उम्र में ऐसी सोच होना किसी भी आंकड़े से कहीं ज्यादा दुर्लभ बात है.

हालांकि कामयाबी के साथ-साथ लोगों की नजरें भी उन पर टिक गईं.

हाल ही में हुए इंडिया ए बनाम श्रीलंका ए टूर्नामेंट के दौरान श्रीलंकाई खिलाड़ियों के साथ मैदान पर हुई बहस की वजह से सूर्यवंशी विवादों में घिर गए. इस घटना ने आक्रामकता, स्वभाव और इतनी कम उम्र में शोहरत संभालने के दबाव को लेकर जबरदस्त बहस छेड़ दी.

इस युवा खिलाड़ी ने बातों से नहीं बल्कि अपने खेल से जवाब दिया.

टूर्नामेंट के फ़ाइनल में जब उम्मीदें और आलोचनाएं अपने चरम पर थीं, सूर्यवंशी ने मैच जिताने वाली 94 रनों की पारी खेली. उन्होंने 'प्लेयर ऑफ़ द मैच' का अवॉर्ड जीता.

यह एक ऐसी शानदार पारी थी जिसने लोगों का ध्यान फिर से उस चीज की ओर खींचा जिसकी वजह से वह सुर्खियों में आए थे, उनका खेल.

वैभव की कहानी का महत्व

हालांकि वैभव कहानी का महत्व क्रिकेट से कहीं ज्यादा है.

दशकों से बिहार ऐसे स्पोर्ट्स स्टार्स तैयार करने के लिए संघर्ष कर रहा है जो अपनी कामयाबी के सफर के दौरान राज्य से गहराई से जुड़े रहें. सूर्यवंशी के आगे आने से बिहार के लाखों युवाओं को एक बहुत बड़ी चीज मिली है, वो है प्रतिनिधित्व.

उनके मौजूदा रिकॉर्ड शायद कभी टूट जाएं. नए रिकॉर्ड बनेंगे और नए टैलेंट सामने आएंगे. लेकिन भारत और खासकर बिहार के युवा क्रिकेटरों की पीढ़ी में उन्होंने जो भरोसा जगाया है, वही शायद उनका सबसे यादगार योगदान साबित होगा.

महज 15 साल की उम्र में वैभव सूर्यवंशी एक असाधारण और निडर बल्लेबाज़ से कहीं बढ़कर बन चुके हैं. वह उम्मीद की एक मिसाल बन गए हैं.

मैंने जान-बूझकर उनकी तुलना सचिन तेंदुलकर या विराट कोहली से नहीं की है. वे खेल के महान खिलाड़ी हैं और हर किसी की अपनी अनोखी कहानी है.

सचिन और कोहली जैसे दिग्गजों से तुलना होना लाज़मी है. लेकिन शायद अभी ऐसी तुलना करना जल्दबाजी होगी. दोनों दिग्गजों का सफर अनोखा रहा है, जिसने भारतीय क्रिकेट को नई दिशा दी.

सूर्यवंशी के सामने चुनौती अगला सचिन या अगला विराट बनने की नहीं, बल्कि पहला वैभव सूर्यवंशी बनने की है. वैभव को अपनी कहानी का पहला अध्याय खुद लिखने का हक है. ये आंकड़े हर मैच और सिरीज के साथ बदलते रहेंगे. लेकिन इनसे एक ऐसे खिलाड़ी की झलक मिलती है जो भविष्य में महान बन सकता है.

वैभव की बैटिंग किसी टीनएजर की तरफ से अब तक देखी गई सबसे जबरदस्त बैटिंग में से एक है. रिकॉर्ड टूटे, नए मुकाम हासिल हुए, गेंदबाज डरे और एक्सपर्ट्स हैरान रह गए.

लेकिन सिर्फ आंकड़ों से यह नहीं समझा जा सकता कि क्या हुआ है. क्योंकि वैभव की सबसे बड़ी कामयाबी आंकड़ों में नहीं, बल्कि भावनाओं में है.

दशकों में पहली बार बिहार को एक ऐसा स्पोर्ट्स आइकन मिला है जो गर्व और बिना किसी झिझक के बिहार से अपनी पहचान जोड़ता है. न झारखंड से, न मुंबई से, न दिल्ली से, न कर्नाटक से. यह फर्क बहुत मायने रखता है, जितना ज्यादातर लोग समझते हैं, उससे कहीं ज्यादा.

एक 15 साल के लड़के ने वह कर दिखाया जो हजारों करोड़ रुपये खर्च करके भी नहीं हो पाया.

सरकारें लोगों की सोच बदलने के लिए बहुत सारा पैसा खर्च करती हैं. ब्रांडिंग की कोशिशें, टूरिज्म कैंपेन, विज्ञापन, कंसल्टेंट्स, रोडशो, इन्वेस्टमेंट समिट. कभी-कभी ये काम कर जाते हैं, तो कभी-कभी नहीं.

फिर भी एक 15 साल के क्रिकेटर ने कुछ ऐसा हासिल किया है जो ऐसे कैंपेन शायद ही कभी कर पाते हैं. उसने बिहार को एक ऐसी जगह पहुंचाया है जहां लोग उम्मीद और गर्व महसूस करते हैं.

सोशल मीडिया पर कुछ दिलचस्प हो रहा है. बिहार के जो लोग कभी अपनी जड़ों के बारे में चुपचाप बात करते थे, वह अब गर्व से उन्हें दिखा रहे हैं. व्हाट्सऐप ग्रुप्स में हलचल है. लिंक्डइन पोस्ट्स में बिहार का जश्न मनाया जा रहा है. सब कुछ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल हो रहा है.

बेंगलुरु, मुंबई, गुड़गांव, दुबई, लंदन और न्यूयॉर्क में युवा प्रोफेशनल्स खुलकर उस पहचान को अपना रहे हैं जिसे कई लोग पहले छिपाकर रखते थे।

गर्व तो हमेशा से था, वैभव ने बस उसे एक पहचान दी.

एमएस धोनी ने एक बार बताया था कि युवराज सिंह मजाक में उन्हें 'ओए बिहारी' कहकर बुलाते थे.

यह उस दौर की सच्चाई को दिखाता था. 'बिहारी' कहलाना अक्सर एक लेबल की तरह देखा जाता था.

कभी प्यार से, तो कभी कमतर समझने के अंदाज में.

हालात कितनी तेजी से बदले हैं. आज 'एक बिहारी सब पर भारी' सिर्फ चुनावों या सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लगाया जाने वाला नारा नहीं रह गया है. यह खेल की दुनिया में भी एक पहचान बन गया है. जब भी वैभव क्रीज पर होते हैं तो डीजे अक्सर इस लाइन का इस्तेमाल करते हैं.

वैभव सूर्यवंशी इस लाइन के सबसे बड़े एंबेसडर हैं. वैभव की एक खास बात यह है कि वह खेल से परे लोगों की सोच बदल रहे हैं. ऐसे समय में जब सोशल मीडिया पर घमंड और विवाद को बढ़ावा मिलता है, वैभव का विनम्र स्वभाव ही उनकी सबसे बड़ी खूबी बन गया है.

उनकी जो तस्वीरें सबसे तेजी से वायरल होती हैं, वे हमेशा उनके छक्के मारने वाली नहीं होतीं. अक्सर वह तस्वीरें वायरल होती हैं जिनमें वह बड़ों के पैर छू रहे होते हैं.

लाखों भारतीयों के लिए वह बिहार की सामाजिक संस्कृति से जुड़े मूल्यों जैसे बड़ों का सम्मान, परिवार से मजबूत जुड़ाव और अपनी संस्कृति से लगाव का प्रतिनिधित्व करते हैं. कोच और खिलाड़ियों का सम्मान करना, परिवार को अहमियत देना और जमीन से जुड़े रहना.

वह अनजाने में ही एक सांस्कृतिक एंबेसडर बन गए हैं. भाषणों से नहीं, विज्ञापनों से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार से.

बिहार को इस मौके को गंवाना नहीं चाहिए

वैभव का असर क्रिकेट से कहीं ज्यादा है और वह पूरी पीढ़ी को प्रेरित कर सकते हैं. वह स्टेडियम तो नहीं बना सकते, लेकिन मुजफ्फरपुर और भागलपुर के बच्चों में सफेद जर्सी पहनने का सपना जरूर जगा सकते हैं.

लेकिन वह ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर तो नहीं बना सकते जो उन सपनों को करियर में बदल दे. यह जिम्मेदारी किसी और की है. बिहार ने कुछ अच्छे कदम उठाए हैं. राजगीर में बनी सुविधाएं एक सच्ची शुरुआत हैं.

लेकिन सिर्फ शुरुआत काफ़ी नहीं है. खेल के मामले में आगे रहने वाले राज्यों की तुलना में बिहार अभी भी काफी पीछे है और सिर्फ अच्छी सोच से यह फासला नहीं मिटाया जा सकता.

एकेडमी बनानी होंगी. जिलों में खेल सुविधाओं के लिए निवेश की ज़रूरत है. स्कूली प्रतियोगिताओं को अहमियत देनी होगी. कोच को सही वेतन और पूरा सम्मान मिलना चाहिए.

टैलेंट के कहीं और जाने का फैसला करने से पहले, जैसा कि बिहार का टैलेंट अक्सर करता रहा है, उनके लिए पेशेवर रास्ते मौजूद होने चाहिए.

दशकों तक बिहार एक ऐसे स्पोर्ट्स आइकन का इंतजार करता रहा जो राज्य के बारे में बाकी भारत की सोच बदल सके. इतिहास के एक अनोखे मोड़ पर, यह बदलाव शायद किसी सरकारी पहल, कॉर्पोरेट कैंपेन या राजनीतिक आंदोलन से नहीं, बल्कि समस्तीपुर के एक निडर किशोर से आया है, जिसके हाथ में क्रिकेट बैट है.

सबसे जरूरी लक्ष्य सीधा-सा है: अगले वैभव सूर्यवंशी को अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए बिहार छोड़ने की जरूरत न पड़े.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.