सोयाबीन की फ़सल पर किसान ने क्यों चलाया ट्रैक्टर, एक ने कहा- खेत में पांव रखने का भी मन नहीं

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"बारिश नहीं होने से हमारी पूरी सोयाबीन की फ़सल सूख गई है. इसमें एक भी फ़ली नहीं लगी है और अब फ़ली आने की उम्मीद भी नहीं है. इसलिए हम इस पर ट्रैक्टर चला रहे हैं."
महाराष्ट्र में बीड ज़िले के सांडस चिंचोली इलाक़े के किसान मौली कदम ने 13 सितंबर को 3 एकड़ में लगी सोयाबीन की फ़सल पर ट्रैक्टर चला दिया.
राज्य के 20 ज़िलों में सूखे जैसी स्थिति पैदा हो गई है. 86 तालुकों में 30 दिनों से ज़्यादा समय से बारिश नहीं हुई है. इसके कारण कुछ जगहों पर खेतों की फ़सलें सूखने लगी हैं, जबकि कुछ जगहों पर फ़सलें ख़राब होने लगी हैं.
बीड जैसी ही स्थिति छत्रपति संभाजीनगर में भी है.
यहां पैठण तालुका के राहतगांव में हमारी मुलाक़ात किसान लक्ष्मण गोरे से हुई.
कपास के खेत में खड़े होकर उन्होंने कहा, "जून में थोड़ी बारिश हुई थी, उसी के भरोसे हमने बुआई कर दी. लेकिन हमें कुछ नहीं मिला. हमने गेहूं और जौ लगाए थे, लेकिन अब चिंता हो रही है, क्योंकि पीने के लिए भी पानी नहीं है और पूरा खेत घास-फूस से भर गया है."
लक्ष्मण ने आगे कहा, "मूंग चली गई, कपास चली गई. सोयाबीन चली गई. अब हमारे लिए बचा ही क्या है? अब सिर्फ़ मज़दूरी करने का ही रास्ता बचा है."
फ़सल को पशुओं के खाने के लिए छोड़ दिया
लक्ष्मण के खेतों से गुज़रते हुए हमें अरहर, मूंग और कपास जैसी फ़सलें बारिश की कमी के कारण सूखती हुई दिखाई दीं. फ़सलों की हालत देखकर लक्ष्मण कहते हैं कि अब उनका खेत में पैर रखने का भी मन नहीं करता.
हमने छत्रपति संभाजीनगर ज़िले के एक खेत में पशुओं को चरते हुए देखा. हम खेत तक पहुंचे तो पता चला कि वहां मूंग बोई गई थी. लेकिन एक महीने से बारिश नहीं होने के कारण मूंग में एक भी फ़ली नहीं लगी थी.
इसलिए यहां के किसान ने हमें बताया कि अब तक इस खेत में जो फ़सल उगी थी, उसे पशुओं के खाने के लिए छोड़ दिया गया है.

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पैठण तालुका में हमारी मुलाक़ात डावरवाड़ी गांव के किसान वसंत जाधव से हुई.
उन्होंने कहा, "मेरे खेत में कुछ संतरे के पेड़ हैं. लेकिन इस साल संतरे के लिए पानी नहीं है. संतरे गिर रहे हैं. कुएँ में पहले पानी रहता था, लेकिन अब वह भी सूख गया है."
पाचोद के सोयाबीन किसान अंकुश नेमाने ने देखा है कि उनके खेत में 9 एकड़ सोयाबीन की फ़सल अब पीली पड़ने लगी है.
अंकुश नेमाने ने कहा, "अब यह सोयाबीन की फ़सल खाने के काम भी नहीं आएगी. दाने का क्या होगा? अब इसे सीधे चारे में बदलना पड़ेगा."
'एक एकड़ की लागत 25,000 रुपये'
हम पैठण में कपास के खेतों में कुछ किसानों के साथ चर्चा कर रहे थे.
वहां एक युवा किसान ने बताया कि कपास की खेती में एक एकड़ की लागत 20 से 25 हज़ार रुपये आती है.
उन्होंने आगे कहा, "सरकार से बस यही उम्मीद है कि सरकार जल्द से जल्द सूखा घोषित करे और 50 हज़ार रुपये प्रति हेक्टेयर की मदद दे."

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इस खरीफ़ सीज़न में 1 जून से 16 सितंबर तक मराठवाड़ा में औसत बारिश 67% हुई है. इस वजह से 33% बारिश की कमी है.
मराठवाड़ा में लातूर ज़िले में बारिश की कमी सबसे ज़्यादा 49% है, जबकि परभणी में 45% बारिश की कमी है.
सुनील वानखेड़े छत्रपति संभाजीनगर संभाग के कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक हैं.
वह कहते हैं, "बारिश के बीच 30-32 दिनों से लेकर 37 दिनों तक का अंतर रहा है. इतने लंबे समय तक बारिश नहीं होने से सोयाबीन, मक्का और कपास जैसी खरीफ़ फ़सलों पर बुरा असर पड़ा है."
20 ज़िलों पर सूखे का ख़तरा मंडरा रहा है
राज्य के 20 ज़िलों में सूखे जैसी स्थिति बन गई है.
इन 20 ज़िलों में सिंधुदुर्ग, सांगली, सोलापुर, अहिल्यानगर, धाराशिव, लातूर, बीड, जालना, परभणी, हिंगोली, नांदेड़, अकोला, वाशीम, अमरावती, यवतमाल, वर्धा, नागपुर, चंद्रपुर, गढ़चिरौली और नंदुरबार शामिल हैं.
इन 20 ज़िलों के 86 तालुकों में 30 दिन तक बारिश नहीं हुई है.
इसमें उत्तर महाराष्ट्र के 31 तालुके, पश्चिम महाराष्ट्र के 17, मराठवाड़ा के 16 और विदर्भ के 22 तालुके शामिल हैं.

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राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने कुछ दिन पहले बताया था कि मुख्यमंत्री ने बारिश की कमी से फ़सल को हुए नुक़सान का सर्वे करने का आदेश दिया है.
मुख्यमंत्री ने राज्य में सूखे की स्थिति का सर्वे 5 अक्तूबर से शुरू करने का आदेश दिया है.
राज्य में बारिश और फ़सल की स्थिति की समीक्षा के लिए हाल ही में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में बैठक हुई.

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बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए देवेंद्र फडणवीस ने कहा, "हमने हर तालुके की स्थिति की जानकारी ली है, यह भी कि कितनी बारिश हुई है. कमी और सूखे से निपटने के लिए क़दम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है. राज्य सरकार किसानों को आगे जो भी मदद देनी होगी, उसके लिए तैयार है."
जल आपूर्ति और स्वच्छता विभाग के आंकड़ों के अनुसार, मानसून के दौरान सितंबर के पहले हफ़्ते में राज्य के 286 गांवों और 1182 घरों में 307 टैंकरों से पीने का पानी पहुंचाया गया.
अगर बारिश नहीं हुई तो महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति और बिगड़ जाएगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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