1973 का अरब-इसराइल युद्ध, जब सऊदी अरब ने लगाया था अमेरिका पर तेल प्रतिबंध जिससे 4 गुना बढ़ गए थे दाम

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
सन् 1967 में छह दिनों की लड़ाई के पहले छह घंटे में ही इसराइली वायुसेना ने मिस्र की वायुसेना को ऐसी चोट पहुंचाई थी जिससे वह कभी उबर नहीं पाए.
पांच जून की सुबह 7 बज कर 45 मिनट पर इसराइली विमानों ने मिस्र के कई हवाई अड्डों पर एक साथ हमला किया. मिस्र के पायलटों के विमान तक पहुंचने से पहले ही मिस्र के अधिकतर विमान हवाई पट्टियों पर ही नष्ट हो गए.
थोड़ी देर बाद एक और हमला कर इसराइली विमानों ने उन विमान पट्टियों को इस्तमाल करने लायक नहीं छोड़ा. इस हमले से मिस्र की वायुसेना उबर नहीं पाई और उनकी इस लड़ाई में बुरी तरह से हार हुई.
यही नहीं इसराइल की थल सेना ने सिनाई रेगिस्तान के बड़े भूभाग और सीरिया की गोलानहाइट्स की पहाड़ियों पर भी कब्ज़ा कर लिया. इस हमले में इसराइल की निर्णायक विजय के बाद से ही मिस्र और सीरिया अपना खोया भू-भाग वापस लेना चाहते थे. उन्होंने इसके लिए 6 अक्तूबर 1973 का दिन चुना.
इतिहास की शिक्षक और पुलित्ज़र पुरस्कार के लिए नामांकित अमरीकी पत्रकार एलेनोर बर्केट ने इसराइल की तत्कालीन प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर की जीवनी 'गोल्डा' में महत्वपूर्ण जानकारी दी है.
वह लिखती हैं, "इसराइल को उसके ऊपर होने वाले मिस्र और सीरिया के हमले का पहला संकेत तब मिला जब इसराइल की मिलिट्री इंटेलिजेंस ने सोवियत ख़ुफ़िया एजेंसी केजीबी के रेडियो ट्रांस्मिशन इंटरसेप्ट किए, जिसमें निर्देश दिए जा रहे थे कि सोवियत विशेषज्ञों के परिवारों को मिस्र और सीरिया से तुरंत हटा लिया जाए. जब भीमकाय सोवियत एंटनोव 22 एस विमान उन लोगों को लेने पहुंचाया तो इसराइलियों के मन मे ख़तरे की घंटी बजनी शुरू हो गई."
"प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर इस ख़बर से चिंतित ज़रूर हुईं लेकिन उनके जनरलों ने इसको ख़ास तवज्जो नहीं दी. इस बीच इसराइली ख़ुफ़िया सूत्रों ने ख़बर दी कि मिस्र की सेना की एक डिवीजन स्वेज़ नहर की तरफ़ बढ़ रही है और उसने करीब एक लाख बीस हज़ार रिज़र्व सैनिकों को ड्यूटी पर बुला लिया है. इसके बावजूद इसराइल के रक्षा मंत्री मोशे दायान की सोच थी कि मिस्र महज़ एक सामान्य सैनिक अभ्यास कर रहा है."
6 अक्तूबर, 1973 योम किप्पुर का दिन था जिसे यहूदियों में साल का सबसे पवित्र दिन माना जाता है. उस दिन पूरे इसराइल में छुट्टी थी. यहां तक कि रेडियो और टेलीविज़न स्टेशन भी छुट्टी मना रहा थे. इसराइल की सेना के तीन चौथाई सैनिक छुट्टी पर अपने घर गए हुए थे.

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मिस्र और सीरिया का संयुक्त हमला
एलेनोर बर्केट गोल्डा मेयर की जीवनी में लिखती हैं, "सुबह 8 बजे गोल्डा अपने दफ़्तर पहुंच चुकी थीं, वह अपने सेनाध्यक्ष डेविड 'डाडो' एलाज़ार और रक्षा मंत्री मोशे दायान के बीच मतभेदों को सुलझाने की कोशिश कर रही थीं. डाडो चाहते थे कि इससे पहले कि मिस्र इसराइल पर हमला करे, इसराइल उस पर हवाई हमला कर उसकी योजनाओं को धूल में मिला दे."
"दूसरी तरफ़ मोशे दायान इस बारे में निश्चित नहीं थे कि युद्ध होने ही जा रहा है. उन्होंने पहले हवाई हमला करने के विचार को ये कह कर नामंज़ूर कर दिया था कि अमेरिका को इसराइल की यह कार्रवाई पसंद नहीं आएगी."
"दायान ने जनरल डाडो के रिज़र्व सैनिकों को बुलाने के अनुरोध को भी अनावश्यक बताया था. उनका कहना था कि आप रिज़र्व सैनिकों को तभी बुलाते हैं जब पहली गोली चल चुकी होती है. मान लीजिए अगर लड़ाई नहीं हुई तो हम उन रिज़र्व सैनिकों से काम क्या करवाएंगे? गोल्डा मेयर ने अपने रक्षा मंत्री का समर्थन करते हुए पहले हमला करने के विचार को ख़ारिज कर दिया था."
दिन के दो बजे अचानक पूरे इसराइल में ख़तरे के सायरन बजने लगे. उत्तर में सीरिया की सेना की पांच डिवीजनों ने 1400 टैंकों और 1000 तोपों के साथ इसराइल की गोलान पहाड़ियों पर तैनात दो ब्रिगेडों पर हमला कर दिया.
यूरी बार जोज़ेफ़ अपनी किताब 'द एंजेल" में लिखते हैं, "इसराइल के पास उस समय उस स्थान पर सिर्फ़ 177 टैंक थे. दक्षिण में मिस्र के एक लाख सैनिक 1300 टैंकों के साथ सिनाई रेगिस्तान में घुस गए थे. हमले के पहले चरण में मिस्र के 32,000 सैनिकों ने छह घंटों में 720 नौकाओं के ज़रिए स्वेज़ नहर पार की."
"हर नौका ने 12 बार राउंड ट्रिप लगाई. मिस्री सैनिकों के स्वेज़ नहर पार करने का इसराइली सैनिकों ने तनिक भी विरोध नहीं किया और न ही उन्होंने कोई जवाबी हमला बोला."

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मिस्र को शुरुआती सफलता
मिस्र के सैनिकों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए इसराइल अपनी वायुसेना पर बहुत अधिक निर्भर कर रहा था.
अमेरिकी विदेश नीति विशेषज्ञ और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश की टीम में रहे, माइकल डोरान अपने लेख 'द हिडेन कैलकुलेशन बिहाइंड योम किप्पुर वॉर' में लिखते हैं, "इसराइल के पायलट सतह से हवा में मार करने वाले सैम मिसाइलों के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे. सन् 1967 में उनका मिस्र के वायु क्षेत्र में पूरा वर्चस्व था. छह साल बाद हालात इस हद तक बदल गए थे कि पहले 24 घंटों में ही उनके 10 से 30 फ़ीसदी युद्धक विमान नष्ट किए जा चुके थे. इसराइल का सैनिक नेतृत्व पूरी तरह से हिला हुआ था."
मिस्री सैनिक बिना किसी विरोध के स्वेज़ नहर के पार उतर गए. उनका एक भी सैनिक हताहत नहीं हुआ. जब इज़राइली टैंक अपनी 'स्विम फ़िंस" पोज़ीशन पर पहुंचे जहां से उन्हें जवाबी हमला करना था तो उन्होंने पाया कि उस पर मिस्री कमांडोज़ का कब्ज़ा हो चुका था. उन्होंने इसराइली टैंक देखते ही उनपर एंटी टैंक मिसाइलों से हमला बोल दिया.
रविवार की भोर होने तक मिस्र के सैनिकों ने स्वेज़ नहर के पूर्वी तट पर अपना मोर्चा बना लिया था और उनका एक भी सैनिक मारा नहीं गया था. साथ-साथ मिस्र के 222 युद्धक जेट विमानों ने स्वेज़ नहर पार कर इज़राइली ठिकानों और रडार स्टेशनों पर बमबारी शुरू कर दी थी.
एलेनोर बर्केट लिखती हैं, "इसराइली सैनिक हतप्रभ होकर इस हमले को देख रहे थे. जब इसराइली टैंक उनका सामना करने के लिए बढ़े तो मिस्र के सैनिकों ने उसका जवाब न सिर्फ़ कंधे के ऊपर से चलाए जाने वाले रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड लॉन्चर्स से दिया, बल्कि उन्होंने कुछ ऐसे हथियार इस्तेमाल किए जिनका सामना इसराइली सैनिकों ने पहले कभी नहीं किया था. युद्ध के 24 घंटे पूरे होने से पहले युद्ध के बारे में इसराइल की हर पुरानी धारणा धराशाई हो चुकी थी."

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परमाणु हथियार इस्तेमाल करने पर विचार
मिस्र के इस हमले से इसराइल के वॉर हीरो रहे रक्षा मंत्री उस हद तक विचलित हो गए कि उनका नर्वस ब्रेकडाउन हो गया और उन्होंने प्रधानमंत्री मेयर के सामने स्वीकारा कि चीज़ों को समझने में उनसे बड़ी भूल हुई है.
उन्होंने इस्तीफ़ा देने की पेशकश की. लेकिन गोल्डा ने उसपर विचार तक करने से इनकार कर दिया.
माइकल डोरान लिखते हैं, "मोशे दायान ने प्रधानमंत्री से यहां तक सिफ़ारिश की कि मिस्र और सीरिया को रोकने के लिए इसराइल परमाणु हथियारों का विकल्प इस्तेमाल करने के बारे में सोचे."
इसकी पुष्टि करते हुए गोल्डा मेयर की जीवनीकार एलेनोर बर्केट लिखती हैं, "कुछ सूत्रों के अनुसार कुछ समय के लिए गोल्डा भी बहुत परेशान हो गई थीं और उन्होंने दायान के अनुरोध पर इसराइल के परमाणु हथियारों को इस्तेमाल करने के लिए तैयार रहने के लिए कह दिया था."
योम किप्पूर युद्ध में इसराइली टैंक डिवीजन का नेतृत्व करने वाले और बाद में इसराइल के प्रधानमंत्री बने एरियल शेरोन ने अपनी आत्मकथा 'वॉरियर' में लिखा था, "मैंने पहली बार इसराइली सैनिकों के चेहरे पर डर नहीं बल्कि आश्चर्य की झलक देखी थी. अचानक उनके साथ वह सब कुछ हो रहा था जिसका अनुभव उन्होंने पहले कभी नहीं किया था. उनका पूरा सैनिक जीवन जीत का अनुभव करते बीता था. वे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि उनके ठीक सामने मिस्र के सैनिक स्वेज़ नहर पार कर रहे थे."

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इसराइल ने रिज़र्व सैनिक बुलाए
शाम होते होते रिज़र्व सैनिकों के घर पर सैनिक मुख्यालय से फ़ोन आने शुरू हो गए थे.
येरुशलम में अपने अनुभवों पर लिखने और हॉलोकॉस्ट पर शोध करने वाली डैबी शपीरो अपने लेख 'रिमेंबरिंग योम किप्पूर वॉर" में लिखती हैं, "अभी भी वह दृश्य याद करके मेरा दिल दहल उठता है जब बहुत सारे लोग घुटने तक सफ़ेद 'कितेल' पहने अपनी यूनिट तक पहुंचने के लिए सड़कों पर क़रीब क़रीब दौड़ रहे थे. उनके पीछे सैंडविच और थर्मस में गर्म कॉफ़ी लिए उनकी पत्नियां भी दौड़ रही थीं. उनको निर्देश मिले थे कि वे तुरंत अपना व्रत तोड़ दें और अपने ठिकानों की तरफ़ रवाना हो जाएं."
"महिलाओं से कहा गया था कि वे घर जाकर अपने पतियों के लिए खाना बनाएं ताकि वे जब मोर्चे पर जाएं तो भूखे न रहें. इस बीच गहरे हरे रंग की सैनिक जीपें सड़कों पर दौड़ रही थीं ताकि वे रिज़र्व सैनिकों को शूल (यहूदी पूजा गृह) से सीधे मोर्चे पर ले जाएं. उनमें से बहुत से लोग कभी वापस अपने घर नहीं लौटे."

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सीरियाई मोर्चे पर इसराइल का जवाबी हमला
उधर गोलानहाइट्स के मोर्चे पर सीरियाई सेना भी इसराइल पर हमला कर रही थी. उनकी पूरी कोशिश थी कि गोलान की ऊंचाइयों पर उनका नियंत्रण हो जाए. लेकिन अगले दिन ही इसराइल ने सीरिया पर जवाबी हमला करना शुरू कर दिया था. 7 अक्तूबर की शाम होते होते इसराइल ने सीरिया की पहली रक्षा लाइन को भेद दिया था.
इसराइल की वायुसेना ने सीरिया के हवाई ठिकानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया था जिसमें राजधानी दमिश्क का हवाई अड्डा भी था. 9 अक्तूबर आते-आते इसराइल के सैनिकों ने सीरिया के सैनिकों को 1967 की युद्ध विराम रेखा के पीछे जाने पर मजबूर कर दिया था.
10 अक्तूबर ख़त्म होते होते इसराइल का सीरिया के वायु क्षेत्र पर नियंत्रण हो गया था.
ऑड्री शुल अपनी किताब 'द योम किप्पूर वॉर में लिखती हैं, "सीरिया ने घबराकर दूसरे अरब देशों इराक़, कुवैत और मोरक्को से सैनिक सहायता की अपील की थी. अगले दिन यह मदद पहुंच भी गई थी. लेकिन इसके बावजूद गोलान हाइट्स के मोर्चे पर इसराइली सैनिकों का बढ़ना जारी रहा."
"11 अक्तूबर को इसराइली सैनिक सीरियाई सीमा के साढ़े नौ किलोमीटर अंदर तक घुस गए थे. 15 अक्तूबर तक इसराइली सैनिक दमिश्क के पास सासा गांव तक पहुंच गए थे. वहां से दमिश्क की दूरी मात्र 32 किलोमीटर थी."

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इसराइल ने बाज़ी पलटी
14 अक्तूबर से लड़ाई का रुख़ बदलना शुरू हुआ क्योंकि उसी दिन से अमेरिकी हथियार इसराइल पहुंचने शुरू हो गए.
जनरल एलाज़ेर ने उसी रात प्रधानमंत्री मेयर को संदेश भेजा, "गोल्डा हालात अब बेहतर हो रहे हैं. हमारी फॉर्म वापस आ रही है और अरब अपने पुराने ढर्रे पर जाते चले जा रहे हैं."
14 अक्तूबर को मिस्र की तीसरी आर्मर्ड ब्रिगेड ने 124 टैंकों के साथ 'मितला पास' पर हमला किया था. आठ घंटे से भी कम समय में उनके 60 टैंक नष्ट हो गए थे. यहां से बाज़ी पलटनी शुरू हो गई थी.
एरियल शेरोन ने मिस्र की थर्ड आर्मी को स्वेज़ नहर के पश्चिमी किनारे पर चारों ओर से घेर लेने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया था. अगले पांच दिनों में दोनों पक्षों के बीच दूसरे विश्व युद्ध के बाद की सबसे बड़ी टैंक लड़ाई हुई थी.
सबसे भयानक लड़ाई 15 अक्तूबर की रात 'चाइनीज़ फ़ार्म' नाम की जगह पर हुई थी.
एरियल शेरोन ने उस लड़ाई का वर्णन करते हुए अपनी आत्मकथा 'वॉरियर' में लिखा है, "लड़ाई इतनी पास से लड़ी गई थी कि आप मिस्र और इसराइल के सैनिकों के शव अगल-बगल पड़े देख सकते थे. दोनों तरफ़ के सैनिक जलते हुए टैंकों से कूदे थे और साथ साथ मरे थे."
शेरोन ने मिस्र के सैनिकों पर दबाव जारी रखा और इसराइली सेना स्वेज़ नहर पार करने में क़ामयाब हो गई.
माइकल डोरान लिखते हैं, "हार के डर से मिस्र ने युद्ध विराम की अपील की. अमेरिका और सोवियत संघ के दवाब में इसराइल ने आगे बढ़ना रोक दिया. इस लड़ाई में मिस्र और सीरिया के कुल 15,600 सैनिक मारे गए और करीब 35,000 सैनिक घायल हुए.
इसराइल ने कुल 2,569 सैनिक खोए और उनके 7,251 सैनिक घायल हुए. इस युद्द में अरब देशों के 440 युद्धक विमान नष्ट हुए जबकि इसराइल ने 102 विमान खोए."

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मिस्र और इसराइल युद्ध विराम के लिए हुए राज़ी
22 अक्तूबर को संयुक्त राष्ट्र ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी. तब तक इसरायली सेना का स्वेज़ शहर से काहिरा जाने वाली सड़क पर नियंत्रण हो चुका था.
ऑड्रे शुल लिखती हैं, "सोवियत संघ और अमेरिका दोनों चाहते थे कि इस लड़ाई में इसराइल की संपूर्ण जीत न हो क्योंकि उन्हें इस बात का डर था कि इसराइल की जीत से नाराज़ अरब देश तेल के उत्पादन में भारी कमी कर सकते हैं. इसराइल ने इस युद्ध विराम को पसंद नहीं किया क्योंकि उनका मानना था कि उन्हें उस समय रोका गया जब वे निर्णायक जीत की तरफ़ बढ़ रहे थे."
"23 अक्तूबर को उन्होंने स्वेज़ नहर के पूर्वी किनारे पर मिस्र की थर्ड आर्मी को घेर लिया और उनके हज़ारों सैनिकों को बंदी बना लिया था. वे मिस्र की राजधानी काहिरा से मात्र 100 किलोमीटर दूर रह गए थे. मिस्र ने घबराकर सोवियत संघ से मदद की गुहार लगाई जिसे उसने तुरंत स्वीकार कर लिया."
26 अक्तूबर को दोनों महाशक्तियों के प्रयास से इसराइल और मिस्र युद्ध विराम के लिए राज़ी हो गए.

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तेल को किया गया हथियार की तरह इस्तेमाल
हालांकि अरब इसराइल युद्ध 26 अक्तूबर तक समाप्त हो गया था लेकिन इसने मध्यपूर्व और विश्व ऊर्जा बाज़ार को पूरी तरह से बदल कर रख दिया.
अंत में इस युद्ध का सबसे बड़ा विजेता साबित हुआ सऊदी अरब, जिसने अमेरिका के युद्ध के दौरान इसराइल को समर्थन दिए जाने के जवाब में उस पर तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया.
पूर्व सीआईए अधिकारी ब्रूस रीडल ने अपने लेख 'फ़िफ़्टी इयर्स एगो सऊदी अरबिया वाज़ द बिगेस्ट विनर ऑफ़ द योम किप्पूर वॉर" में लिखा, "सन् 1814 में ब्रिटेन द्वारा वॉशिंगटन को जलाए जाने के बाद से किसी अन्य देश ने अमेरिका को इतना बड़ा आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचाया जितना सऊदी अरब ने."
"अरब इसराइल युद्ध शुरू होने से पहले ही एक गुप्त बैठक में मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात ने सऊदी शाह फ़ैसल को सलाह दी थी कि वह ज़रूरत पड़ने पर तेल के हथियार का इस्तेमाल करने के लिए तैयार रहे."
"17 अक्तूबर को सऊदी विदेश राज्य मंत्री ओमर सक़्क़ाफ़ ने राष्ट्रपति निक्सन से मिल कर शाह फ़ैसल का एक पत्र उन्हें दिया जिसमें कहा गया था कि अगर अमेरिका ने इसराइल को दो दिनों के अंदर हथियार देने बंद नहीं किए तो सऊदी अमेरिका को तेल भेजने पर प्रतिबंध लगा देगा."
"निक्सन ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. सऊदी ने पहले अपने उत्पादन में 10 फ़ीसदी की कटौती की और फिर अमेरिका को तेल भेजना बंद कर दिया."

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विश्व अर्थव्यवस्था हिली
अमेरिका पर तेल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए जाने के दूरगामी परिणाम देखने में आए.
जुलाई, 1973 में जिस तेल का दाम 2.90 डॉलर प्रति बैरल हुआ करता था वह दिसंबर, 1973 में बढ़कर 11.65 डॉलर प्रति बैरल हो गया.
इस प्रतिबंध ने पूरी अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मंदी ला दी जिसने लाखों अमेरिकियों के जीवन को प्रभावित किया.
1971 की लड़ाई के आर्थिक प्रभाव से जूझ रहे भारत का तेल आयात बजट भी लगभग तीन गुना बढ़ गया.
महंगाई बढ़ने के कारण सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलनों की बाढ़ सी आ गई जिसने भारत की राजनीति को बहुत हद तक प्रभावित किया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































