सीजेपी आंदोलन क्या मोदी सरकार के ख़िलाफ़ कांग्रेस के लिए मौक़ा है?

राहुल गांधी, प्रियंका गांधी

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    • Author, शिवांगी जायसवाल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
    • ........से, नई दिल्ली
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के 'संसद चलो' प्रदर्शन और प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई ने शिक्षा व्यवस्था और सरकार की जवाबदेही के मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया.

कांग्रेस, सपा, टीएमसी, शिवसेना (उद्धव ठाकरे), एनसीपी, आम आदमी पार्टी और बीजेडी समेत कई विपक्षी दल प्रदर्शनकारियों के समर्थन में सामने आए हैं और केंद्र सरकार से केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग की है.

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के मंगलवार को पीएम आवास के बाहर दिए गए धरने के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने उन पर छात्रों के मुद्दे का राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगाया है. हालांकि, उन्होंने दावा किया है कि सरकार नीट के मुद्दे पर संसद में चर्चा करने के लिए सौ फ़ीसदी तैयार है.

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या कॉकरोच जनता पार्टी के इस प्रदर्शन के ज़रिए संयुक्त विपक्ष को बीजेपी के ख़िलाफ़ एक नया राजनीतिक मंच मिल गया है या फिर यह एक अस्थायी गोलबंदी भर है? सवाल यह भी है कि इस गति का राजनीतिक लाभ किस दल को मिल सकता है?

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क्या यह अन्ना आंदोलन जैसा पल है ?

सोमवार को संसद मार्ग पर आगे बढ़ते प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए बैरिकेडिंग लगाई गई थीं

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द हिन्दू की पूर्व एसोसिएट एडिटर रह चुकीं वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार स्मिता गुप्ता 2011 और जुलाई 2026 के राजनीतिक दौर के बीच समानताएं देख रही हैं.

उन्होंने कहा, "2011 में बीजेपी तब की कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मोर्चा खोले हुए थी. मगर आम जनता ने तब के विपक्षी दल बीजेपी के बजाय अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' मूवमेंट पर भरोसा जताया था. इसके बाद, जैसा कि सभी जानते हैं, 2014 में कांग्रेस के हाथ से सत्ता चली गई और नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में बीजेपी की सरकार बनी."

वह कहती हैं कि आज यही स्थिति कांग्रेस के साथ है. वह लंबे समय से शिक्षा व्यवस्था का मुद्दा उठाकर प्रदर्शन कर रही थी, लेकिन उसे जनता का समर्थन नहीं मिला. मगर जब इसी मुद्दे को इंटरनेट पर एक 'शिक्षित और जागरूक आम नागरिक' अभिजीत दीपके ने उठाया, तो लोगों ने अभूतपूर्व समर्थन दिया और वह 'कॉकरोच जनता पार्टी' के रूप में ज़मीन पर उतर आई.

स्मिता गुप्ता का क़ोट
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उनका मानना है कि कॉकरोच जनता पार्टी ने सरकार के ख़िलाफ़ आम लोगों के मन में उपजे गुस्से को आवाज़ दी है, लेकिन इसकी क्षमता यहीं समाप्त हो जाती है. वह कहती हैं, "मैं समझती हूं कि जिस तरह का गुस्सा आम लोगों में उपजा है, वह अब सीजेपी की क्षमता और रणनीतिक ताकत से आगे की चीज़ है. इसलिए यह आंदोलन विपक्षी दलों के लिए एक मौक़ा बन गया है."

उधर, लंबे समय तक कांग्रेस की कवरेज करने वाले वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार रशीद किदवई इन दोनों प्रदर्शनों के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को अलग-अलग मानते हैं.

उन्होंने कहा, "2011 का आंदोलन इसलिए बहुत बड़ा बन गया था क्योंकि तब मुख्यधारा का मीडिया प्रदर्शनकारियों की बात उठा रहा था. आज इसके उलट हो रहा है. वही मीडिया इस प्रदर्शन को बदनाम कर रहा है और स्वतःस्फूर्त प्रदर्शन में पाकिस्तानी एंगल ढूंढ रहा है."

वह कहते हैं, "सोशल मीडिया भले ही आज बड़ी ताकत हो, मगर यह मोबाइल उपयोगकर्ताओं की रुचि के हिसाब से कंटेंट दिखाता है. ऐसे में इसके ज़रिए बहुत बड़ी संख्या में लोगों को लंबे समय तक लामबंद करना मुश्किल है."

क्या कांग्रेस बनेगी राजनीतिक लाभार्थी?

धरने पर बैठे राहुल गांधी से बात करने के लिए केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह पहुंचे थे

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वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, "सभी क्षेत्रीय पार्टियां बेहद कमज़ोर हो चुकी हैं, इसलिए सीजेपी के बनाए माहौल का राजनीतिक लाभ कांग्रेस को ही मिल सकता है. अब देखने की बात होगी कि वह इस मुद्दे को कितनी दूर तक ले जा पाती है, क्योंकि बीजेपी के पास भी इसे कुचलने की तमाम रणनीतियां होंगी."

बीजेपी की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने कहा कि 2011 के आंदोलन के बाद यूपीए शासन के ऊपर जो दबाव आया और कई मंत्रियों के इस्तीफ़े हुए, उसका एक अहम कारण यह था कि बीजेपी ने उस आंदोलन को आगे बढ़ाया.

20 जुलाई के प्रदर्शन के बाद बीजेपी पर दबाव तो बना है, मगर इसे बरक़रार रखना विपक्ष के हाथ में है. हालांकि, विपक्षी दल अभी से आपस में लड़ते दिख रहे हैं.

ग़ौरतलब है कि पीएम आवास के बाहर राहुल गांधी के धरने को लेकर आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने विरोध जताया. उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया, "सीजेपी के धरने को कमज़ोर करने के लिए मोदी जी ने राहुल गांधी को अपने आवास पर धरने पर बिठा दिया है."

हालांकि, कॉकरोच जनता पार्टी के आधिकारिक एक्स हैंडल पर संजय सिंह के इस दावे को ख़ारिज किया गया. सीजेपी की ओर से कहा गया है कि नेता विपक्ष राहुल गांधी अपना कर्तव्य निभा रहे हैं.

ध्यान रहे कि एक समय अभिजीत दीपके राहुल गांधी की राजनीति की आलोचना करते रहे हैं. पत्रकार अजीत अंजुम को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि पहले यह उनका निजी विचार था, लेकिन कांग्रेस शिक्षा से जुड़ी सीजेपी की मांग का समर्थन कर रही है. इसलिए उनकी सोच में बदलाव आया है.

हेमंत अत्रि का बयान

भास्कर समूह के पूर्व राष्ट्रीय राजनीतिक संपादक हेमंत अत्रि मानते हैं कि 20 जुलाई को हुए प्रदर्शन से बने इस मोमेंटम को विपक्षी दलों में सिर्फ़ कांग्रेस ही आगे ले जा सकती है. इसका एक कारण वे क्षेत्रीय दलों की कमज़ोर स्थिति को मानते हैं.

उन्होंने कहा, "अगर आम आदमी पार्टी में क्षमता होती, तो वह सीजेपी के आंदोलन को अपना आंदोलन बना सकती थी, क्योंकि अभिजीत दीपके उनसे जुड़े रहे हैं. मगर इस आंदोलन ने आप को उजागर कर दिया है कि दिल्ली में अब उसके पास सांगठनिक ताक़त नहीं बची है."

हालांकि, ध्यान रखना चाहिए कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है.

वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता का मानना है कि आम आदमी पार्टी के विरोध के पीछे पंजाब का आगामी विधानसभा चुनाव है, जहाँ उसके सामने कांग्रेस की ही चुनौती है. ऐसे में वह सीजेपी के समर्थन वाले मुद्दे पर भी कांग्रेस के साथ खड़ी नहीं दिखना चाहेगी.

20 जुलाई के 'संसद चलो' प्रदर्शन के दौरान दिल्ली में लंबे समय के बाद बड़ा विरोध प्रदर्शन देखा गया, जो सीजेपी के आह्वान पर हुआ.

ये प्रदर्शन सीजेपी का या जनता का

जंतर मंतर से वांगचुक को ले जाने के बाद सीजेपी प्रदर्शन स्थल को घेरे खड़े सुरक्षा बल

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इन विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही यह प्रदर्शन कॉकरोच जनता पार्टी के आह्वान पर हुआ हो, मगर इतनी अधिक तादाद में प्रदर्शनकारियों के जुट जाने का अंदाज़ा खुद आयोजकों को भी नहीं था.

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्रि कहते हैं कि इसी कारण प्रदर्शन के दौरान कई बदइंतज़ामी भी देखने को मिलीं. उनके मुताबिक़, "इसे जनता का आंदोलन कहा जाना चाहिए. यह गुस्सा किसी न किसी बहाने सामने आना था और इसे सीजेपी का मंच मिल गया. जनता के गुस्से ने विपक्ष को केंद्र के सामने लाकर खड़ा कर दिया. लोग पूछते थे कि विपक्ष कहाँ है."

स्मिता गुप्ता ने कहा, "भले ही 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बनाए जाने के पीछे सीजेआई सूर्यकांत की कॉकरोच से जुड़ी टिप्पणी रही हो, मगर जब इस प्लेटफॉर्म को दो करोड़ से ज़्यादा सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं का समर्थन मिला, तो समर्थकों की भावनाओं की ज़िम्मेदारी अभिजीत दीपके ने ली. वह अपनी पढ़ाई और करियर छोड़कर भारत आए और इसे एक आंदोलन में बदल दिया."

वह दीपके को ऐसे व्यक्ति के रूप में देख रही हैं, जो हर राजनीतिक घटनाक्रम के साथ राजनीति सीख रहा है. इसी आधार पर वह कहती हैं कि अब सिर्फ़ विपक्षी राजनीतिक दल ही इस गति को बरक़रार रख सकते हैं.

हेमंत अत्रि मानते हैं कि वांगचुक और दीपके के गठजोड़ के पीछे ऐसी राजनीतिक ताक़त काम कर रही है, जो "विपक्ष के लिए स्पेस नहीं छोड़ना चाहती." साथ ही, वे उनके अनशन ख़त्म करने की घोषणा में विपक्ष के सामने शर्त रखने और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की शर्त को छोड़ देने की मंशा पर सवाल उठाते हैं.

इस मामले में पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं कि जैसे-जैसे आंदोलन बढ़ता है, उससे जुड़ी रणनीतियां भी बदलती जाती हैं.

क्षेत्रीय दलों के लिए क्या अवसर

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संसद तक पहुंचने के मक़सद से हुए 20 जुलाई के प्रदर्शन में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के चलते कई प्रदर्शनकारी घायल हो गए. इसे लेकर पूरे विपक्ष ने एक सुर में इसका विरोध किया है.

सपा, एनसीपी, शिवसेना (उद्धव ठाकरे), आम आदमी पार्टी और ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी के प्रमुख नेताओं ने जंतर-मंतर पर जाकर घायल प्रदर्शनकारियों के प्रति एकजुटता दिखाई.

इन नेताओं में शरद पवार भी शामिल रहे, जबकि ममता बनर्जी ने प्रदर्शन में शामिल होने की घोषणा की है. उधर, बीजू जनता दल के अध्यक्ष और ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग की है.

चारों विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समय कांग्रेस के अलावा क्षेत्रीय विपक्षी दलों के अस्तित्व के लिए भी अहम हो सकता है.

हिन्दुस्तान टाइम्स की राष्ट्रीय राजनीतिक संपादक सुनेत्रा चौधरी ने एक्स पर लिखा है, "जब ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग करने लगे, तो आप समझ सकते हैं कि मामला कितना गंभीर हो गया है. नवीन पटनायक आमतौर पर विवादित राजनीतिक मुद्दों पर तटस्थ रुख रखने और किसी पक्ष में खुलकर न आने के लिए जाने जाते हैं."

वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा कि शिक्षा का मुद्दा हर राज्य से जुड़ा है. टीएमसी और शिवसेना जैसे विभाजन का सामना कर चुके दलों के लिए यह मुद्दा अपना मतदाता आधार मज़बूत करने का मौक़ा हो सकता है. ऐसे में वे इसे उठा रहे हैं और सभी ने प्रदर्शनकारियों की वह भीड़ देखी है, जो सालों बाद दिल्ली में देखने को मिली.

वह कहती हैं कि सपा के लिए सीजेपी के समर्थन में उतरने के पीछे उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए एक अहम मक़सद है. इसलिए वह सीजेपी के प्रदर्शन में डिंपल यादव की मौजूदगी और राहुल गांधी के धरने में अखिलेश यादव की मौजूदगी को अहम मानती हैं. यह दल उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ गठबंधन में विधानसभा चुनाव लड़ सकता है.

अचानक राहुल धरने पर क्यों बैठे

रशीद किदवई का क़ोट

छह जून को अभिजीत दीपके के भारत लौटने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को ज़मीन पर उतार दिया.

दिल्ली, पुणे, जयपुर और लखनऊ जैसे शहरों में छोटे-छोटे प्रदर्शनों के बाद वे 20 जून से जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे, जिसका सीपीआई के छात्र संगठन आइसा ने समर्थन किया.

28 जून को इस धरने में सोनम वांगचुक ने भूख हड़ताल शुरू कर दी. इस दौरान कुछ राजनीतिक दलों के नेता सीजेपी के मंच पर व्यक्तिगत स्तर पर शामिल हुए. इसके बाद आम आदमी पार्टी और शिवसेना (उद्धव ठाकरे) ने भी इसे समर्थन दिया.

मगर इस पूरी अवधि में कांग्रेस ने सीजेपी के प्रति काफ़ी सधा हुआ और सीमित समर्थन जताया. एक बार कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ज़रूर अनशन कर रहे वांगचुक से मिलने पहुंचे थे. मगर 20 जुलाई के 'संसद चलो' प्रदर्शन के अगले दिन राहुल गांधी मुख़र हो उठे.

रशीद किदवई का मानना है कि कांग्रेस इसलिए सधी हुई प्रतिक्रिया दे रही थी, क्योंकि वह सीजेपी को परखना चाहती थी कि इसके पीछे कोई राजनीतिक ताक़त तो काम नहीं कर रही.

वह कहते हैं, "अन्ना आंदोलन के समय के आंदोलनकारियों ने आम आदमी पार्टी बना ली, इसलिए कांग्रेस पार्टी अपना अलग प्रदर्शन जारी रखे हुए थी. वह इसी मुद्दे पर हो रहे सीजेपी आंदोलन में पिछलग्गू नहीं बनना चाहती थी."

वे मानते हैं कि सीजेपी के मंच पर राहुल गांधी के आकर समर्थन करने की संभावना बहुत कम है और कांग्रेस अब जनता की इस मांग का नेतृत्व करने का मन बनाती दिख रही है.

उधर, हेमंत अत्रि का दावा है कि कांग्रेस के मुख़र हो जाने के पीछे की कहानी बीते 24 घंटे के घटनाक्रम में छिपी है.

उनके मुताबिक़, कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व की सक्रियता 20 जुलाई के प्रदर्शन के बाद हुई घटनाओं का परिणाम थी. उनका दावा है कि सोमवार को प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी ने इस पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन पुलिस कार्रवाई और घायल प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें सामने आने के बाद कांग्रेस सक्रिय हुई.

कांग्रेस ने अपने सेवा दल को जंतर-मंतर पर भेजा. अगले दिन राहुल गांधी ने अस्पताल जाकर घायल छात्रा के परिजनों से मुलाक़ात की. प्रदर्शनकारियों को कानूनी मदद का भरोसा दिया और फिर मंगलवार शाम कांग्रेस नेतृत्व ने अचानक पीएम आवास के बाहर विरोध प्रदर्शन करने का फ़ैसला किया.

वे सूत्रों के हवाले से कहते हैं, "कल खड़गे के जन्मदिन पर कई कांग्रेस सांसद उनसे मिलने आए तो उनसे अंतिम समय में कहा गया कि पीएम आवास पर चलकर धरना करना है. इससे पहले यह योजना सिर्फ़ कांग्रेस नेता राहुल गांधी, पार्टी अध्यक्ष खड़गे और कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल तक सीमित थी."

अत्रि के मुताबिक़, इसके बाद यह मुद्दा छात्र आंदोलन से आगे बढ़कर बड़े राजनीतिक विरोध में बदल गया. "ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी लोकसभा में विपक्ष के नेता को पुलिस इस तरह से उठाकर ले गई."

क्या केंद्र दबाव में है

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वीडियो कैप्शन, दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज

पत्रकार विजय त्रिवेदी मानते हैं कि 20 जुलाई के प्रदर्शन और 21 जुलाई को राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव के धरने ने सरकार पर दबाव बनाया है.

उनका कहना है, "धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए था."

रशीद किदवई का मानना है कि एक महीने से जंतर-मंतर पर जारी आंदोलन के दौरान ही नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को धर्मेंद्र प्रधान पर कोई फ़ैसला ले लेना चाहिए था. सरकार धर्मेंद्र प्रधान का मंत्रालय बदल सकती थी. मगर अब भी कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं कि वह इस मामले में कोई सख़्त क़दम तुरंत उठाने जा रही है.

उन्होंने कहा कि मंगलवार को ही पीएम मोदी ने एनडीए सांसदों की बैठक के दौरान कहा कि नीट पेपर लीक करने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई होगी. मगर वे कहते हैं कि इसे किसी संकेत के रूप में नहीं लिया जा सकता कि वह केंद्रीय शिक्षा मंत्री को हटा देंगे.

इधर, मंगलवार देर रात केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने राहुल गांधी और कांग्रेस पर छात्रों के मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि सरकार संसद में नीट और शिक्षा संबंधी सभी मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन कांग्रेस ने बहस के बजाय प्रदर्शन का रास्ता चुना. प्रधान के मुताबिक़, सरकार छात्रों की चिंताओं के समाधान, सुधार और जवाबदेही के लिए प्रतिबद्ध है, जबकि छात्रों को राजनीतिक अभियान का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए.

विजय त्रिवेदी मानते हैं कि राहुल गांधी की पहली प्राथमिकता संसद में नीट के मुद्दे पर बहस होनी चाहिए. वे सदन में इस्तीफ़े की मांग उठा सकते हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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