You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
पश्चिम बंगाल चुनाव: इस बार ऐसा क्या-क्या हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ
- Author, शुभज्योति घोष
- पदनाम, बीबीसी बांग्ला
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
डेढ़ महीने से अधिक समय तक चली चुनाव की लंबी प्रक्रिया के बाद, पश्चिम बंगाल अब 4 मई का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है. यह वह दिन है जब मालूम चलेगा कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) राज्य में लगातार चौथी बार सत्ता में लौटेगी या भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पश्चिम बंगाल में पहली बार सत्ता हासिल करेगी.
भारत में, मतदान समाप्त होने और मतगणना शुरू होने के बीच का समय आमतौर पर 'एग्ज़िट पोल' या मतदान के बाद के सर्वे में गहरी दिलचस्पी और बहस वाला होता है.
पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर अब तक आए लगभग सभी एग्ज़िट पोल से संकेत मिलते हैं कि टीएमसी और बीजेपी के बीच वोट शेयर का अंतर काफ़ी कम रहेगा. और अगर किसी एक पार्टी को बहुमत मिलता भी है, तो उसकी जीत का अंतर बहुत बड़ा होने की संभावना नहीं है.
इसी के कारण नतीजों को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं. कई लोगों का मानना है कि इस चुनाव में दोनों प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
बीते करीब 50 साल से पश्चिम बंगाल में ज़्यादातर एकतरफ़ा चुनाव होते रहे हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो चाहे कांग्रेस हो, लेफ़्ट हो या फिर टीएमसी, जिस भी पार्टी को जीत मिली, उसे भारी बहुमत भी हासिल हुआ.
इसलिए अगर एग्ज़िट पोल के संकेत वाकई में कड़े मुकाबले में तब्दील होते हैं, तो यह राज्य के लिए एक असाधारण घटना होगी.
हालांकि, ऐसे परिदृश्य के हकीकत बनने को लेकर अनिश्चितता भी बनी हुई है. एग्ज़िट पोल कभी भी पूरी तरह विश्वसनीय नहीं होते. यह पूरी तरह संभव है कि कोई एक पार्टी 200 या उससे अधिक सीटें जीतकर आसानी से सरकार बना ले.
हालांकि, पश्चिम बंगाल में हाल ही में संपन्न हुए चुनाव कई अन्य कारणों से बिल्कुल अलग थे. उसके बारे में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है.
दोनों प्रमुख पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व, उम्मीदवारों और राजनीतिक हस्तियों, चुनाव आयोग और केंद्रीय सुरक्षा बलों ने ऐसे कदम उठाए हैं जिन्होंने इस चुनाव को एक बिल्कुल नया आयाम दिया है.
लेकिन वे कौन से कारण थे जिन्होंने पश्चिम बंगाल के इस चुनाव को इतना अनूठा बना दिया? यह रिपोर्ट इसी सवाल का जवाब देने की कोशिश करती है.
काफ़ी हद तक हिंसा मुक्त
पश्चिम बंगाल लंबे समय से राजनीतिक हिंसा से जुड़ा रहा है. ख़ासकर चुनावी हिंसा. यह राज्य में सभी दलों के शासनकाल में एक हकीकत रही है.
मतदान बूथों पर कब्जा करना, धांधली, राजनीतिक हत्याएं, मतदान रोकने के लिए डराना-धमकाना और किसी विशेष दल के प्रभुत्व वाले क्षेत्रों में विरोधी दलों के पोलिंग एजेंट्स को एंट्री नहीं देना. ये सब राज्य की राजनीति का हिस्सा बन गए थे.
ऐसे इतिहास के बावजूद यह चुनाव लगभग पूरी तरह से शांतिपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ. मतदान के दोनों चरणों में, राज्य में कहीं भी हिंसा के कारण एक भी मौत की सूचना नहीं मिली. इसके अलावा कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़कर, कोई बड़ी गड़बड़ी की शिकायतें भी नहीं मिलीं.
पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान होने के बाद चुनाव आयोग ने एक भी बूथ पर दोबारा वोटिंग का आदेश नहीं दिया.
दूसरे चरण में 142 सीटों पर वोटिंग हुई है. लेकिन अभी तक वहां भी किसी भी बूथ पर दोबारा वोटिंग का आदेश जारी नहीं हुआ है.
इसका एक प्रमुख कारण केंद्रीय सुरक्षा बलों की भारी तैनाती है. चुनावी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्य में अर्धसैनिक बलों के रिकॉर्ड दो लाख 40 हज़ार जवान तैनात किए गए थे.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 29 अप्रैल को कहा कि इन बलों में से लगभग एक तिहाई, करीब 70 हज़ार जवान, वोटिंग होने के बाद भी दो महीने तक राज्य में ही रहेंगे.
पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हिंसा का लंबा इतिहास रहा है. इसमें हारे हुए दलों के समर्थकों को अपने गांवों से भागने के कई उदाहरण शामिल हैं. ऐसे में इस कदम को समाधान के तौर पर सही ठहराया जा रहा है.
हालांकि, चुनाव के बाद हिंसा को रोकने में यह कितना कारगर होगा, यह तो आने वाले दिनों में ही साफ़ होगा लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि 2026 के विधानसभा चुनाव ने राज्य में राजनीतिक हिंसा के इतिहास में एक नई इबारत लिखी है.
रिकॉर्ड तोड़ मतदान
इस चुनाव के दोनों चरणों में कुल मतदान प्रतिशत 92.47% रहा. ये भारत की स्वतंत्रता के बाद से पश्चिम बंगाल में किसी भी चुनाव में अब तक का सबसे अधिक मतदान है.
हालांकि राज्य में परंपरागत रूप से अन्य कई राज्यों की तुलना में ज़्यादा वोटिंग देखी जाती रही है. लेकिन शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में 90% या उससे अधिक मतदान पश्चिम बंगाल के लिए भी अभूतपूर्व है.
चुनाव आयोग के मुताबिक इससे पहले सबसे अधिक मतदान (प्रतिशत के हिसाब से) 2011 के विधानसभा चुनावों में दर्ज किया गया. उस चुनाव में 84.72% मतदान हुआ था. लेकिन यह रिकॉर्ड अब टूट चुका है.
कई पर्यवेक्षक इस असामान्य रूप से उच्च मतदान को मतदाता सूचियों के 'विशेष गहन संशोधन' (एसआईआर) से जोड़ रहे हैं.
उनका तर्क है कि मतदाता सूचियों से 90 लाख से ज़्यादा नाम हटाए जाने के कारण मतदाता सूची काफ़ी छोटी हो गई है और यह ज़्यादा वोटिंग होने की वजह है.
एक अन्य तर्क यह है कि एसआईआर प्रक्रिया में 'तार्किक विसंगतियों' के कारण, कई वैध मतदाता भी बाहर रह गए. इससे मतदाता सूचियों में शामिल लोगों में यह डर पैदा हो सकता है कि "हमें इस बार मतदान करना ही होगा, अन्यथा भविष्य में हमारे नाम हटाए जा सकते हैं."
दूसरे शब्दों में, नागरिक अधिकारों के संभावित हनन की चिंताओं ने भागीदारी को प्रेरित किया होगा.
इससे यह भी साफ़ हो सकता है कि क्यों कई मतदाता अपने निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान करने के लिए वापस लौटे. इनमें बड़ी संख्या में प्रवासी मज़दूर अन्य राज्यों से अपने गांव वापस आए.
इसके पीछे जो भी कारण हो, पश्चिम बंगाल में 2026 के चुनाव में मतदान का ऐसा रिकॉर्ड बन गया है टूटना मुश्किल हो सकता है.
ज़मीन पर मोदी और शाह की मौजूदगी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आम तौर पर देश में कहीं भी चुनाव प्रचार करने के बाद रात में दिल्ली लौटते हैं.
चाहे बात तमिलनाडु की हो या अरुणाचल प्रदेश की, ऐसे कई उदाहरण हैं जब उन्होंने एक दिन में तीन या चार रैलियों को संबोधित किया और फिर राजधानी लौट आए.
हालांकि, इस चुनाव के दौरान इस परंपरा को तोड़ते हुए वे कई बार कोलकाता के राजभवन में रात भर रुके.
इतना ही नहीं, उन्हें सुबह-सुबह गंगा घाटों पर जाते, आम लोगों से बातचीत करते और कैमरे के साथ नदी में नौका विहार करते भी देखा गया.
उन्होंने उत्तरी कोलकाता की सड़कों और पड़ोसी हावड़ा की तंग गलियों में रोड शो किए और जनता के बेहद करीब पहुंचे. उन्होंने यह भी घोषणा की कि अगर बीजेपी जीतती है तो वे स्वयं शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होंगे.
मोदी मंत्रिमंडल के दूसरे सबसे प्रमुख व्यक्ति अमित शाह भी कई दिनों तक पश्चिम बंगाल में सक्रिय रहे. उन्होंने राज्य भर में लगातार रैलियों को संबोधित किया.
जब विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाया कि देश के गृह मंत्री कोलकाता में चुनाव प्रचार में इतना समय क्यों बिता रहे हैं, तो शाह ने इस पर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया.
ये तस्वीरें दिखाती हैं कि मोदी के नेतृत्व में बीजेपी पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल करने के लिए कितनी दृढ़ संकल्पित है.
बीजेपी के वैचारिक पूर्वज जनसंघ की सह‑स्थापना इसी राज्य के श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी, इसलिए पश्चिम बंगाल पर शासन करना लंबे समय से उसका एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य रहा है.
इस चुनाव को उस महत्वाकांक्षा को सच करने का सबसे अच्छा मौका माना जा रहा है. शायद यही कारण है कि मोदी ने खुद घोषणा की, "मैं हर सीट पर उम्मीदवार हूं."
क्या ममता बनर्जी कुछ हद तक परेशान हैं?
दिलचस्प बात यह है कि नरेंद्र मोदी ने इस चुनाव में जिस बात का ज़िक़्र किया, वही बात ममता बनर्जी, जो पिछले 15 साल से मुख्यमंत्री हैं, लगभग हर चुनाव में कहती आ रही हैं.
वह अक्सर मतदाताओं से कहती हैं, "आपको इस बात की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है कि आपके निर्वाचन क्षेत्र में तृणमूल का उम्मीदवार कौन है. मान लीजिए कि मैं सभी 294 सीटों पर उम्मीदवार हूं. मुझे ध्यान में रखकर वोट दें."
इस वजह से विरोधी तंज़ कसते हुए कहते हैं कि तृणमूल कांग्रेस में वास्तव में केवल एक ही 'पोस्ट' है- ममता बनर्जी- और बाकी सब महज़ 'लैम्प पोस्ट' हैं.
यह उनके गढ़ में उनकी राजनीतिक ताकत के प्रति उनके आत्मविश्वास को भी दिखाता है.
दरअसल, वह जादवपुर और दक्षिण कोलकाता जैसे निर्वाचन क्षेत्रों से लगातार 42 सालों से जीतती आ रही हैं. उनकी मौजूदा सीट भवानीपुर भी इसी क्षेत्र में आती है.
यहां तक कि 2004 के लोकसभा चुनावों में भी जब टीएमसी ने राज्य में एक ही सीट जीती थी, तब भी उन्होंने इस क्षेत्र में अपनी जीत को बरकरार रखा था.
इतिहास के नज़रिए से देखें तो उन्होंने यहां आसानी से जीत हासिल की है. अक्सर उन्हें ज़्यादा प्रचार की जरूरत भी नहीं पड़ी. हरीश चटर्जी स्ट्रीट स्थित उनका पैतृक घर भी इसी निर्वाचन क्षेत्र में आता है.
लेकिन इस बार भवानीपुर से बीजेपी के सुवेंदु अधिकारी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ते हुए, उन्हें पूरे निर्वाचन क्षेत्र में ज़ोर-शोर से प्रचार करते देखा गया. कई बार तो वह अपना आपा भी खो बैठीं. इससे कई पर्यवेक्षक हैरान रह गए.
29 अप्रैल को मतदान के दिन उन्हें देखने वालों ने गौर किया कि उनके हाव-भाव में आत्मविश्वास की कमी दिख रही थी.
लगातार 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद, वे निस्संदेह सत्ता-विरोधी लहर का सामना कर रही हैं. उनके प्रशासन पर भ्रष्टाचार और शासन में विफलताओं के कई आरोप भी लगे हैं.
टीएससी का डिफ़ेंसिव पोज़िशन में यह चुनाव लड़ना, इस मुकाबले की एक ख़ास बात रही.
क्या 'बंगाली अस्मिता' पर ज़ोर ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही रहा?
भारत के विभिन्न राज्यों में चुनावों के दौरान, स्थानीय संस्कृति, भाषा और खान-पान की आदतें अक्सर राजनीतिक मुद्दे बन जाती हैं. समय-समय पर इन मुद्दों पर काफ़ी बहसें भी हुई हैं.
लेकिन, पश्चिम बंगाल में हाल के समय में 'बंगाली अस्मिता' का चुनावी चर्चा पर हावी होना शायद ही कहीं और देखने को मिलता है.
इसका एक मुख्य कारण यह है कि सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने लगातार खुद को बंगाल और बंगालियों की पार्टी के रूप में पेश किया है. साथ ही दावा किया है कि बंगाली संस्कृति की रक्षा के लिए वही सबसे सही हैं.
दरअसल, 2021 के चुनाव में उसका मुख्य नारा था, "बंगाल अपनी बेटी चाहता है."
इस चुनाव से पहले भी, पश्चिम बंगाल के लोगों को बांग्लादेशी होने के संदेह में अन्य राज्यों में परेशान किए जाने की घटनाओं को 'बंगालियों पर ख़तरे' के सबूत के रूप में पेश किया गया था.
दूसरी ओर बीजेपी को इस धारणा से जूझना पड़ा है कि वह मूल रूप से हिंदी भाषी क्षेत्र की पार्टी है. और इसका बंगाल से सांस्कृतिक रूप से कोई संबंध नहीं है.
यहां तक कि बंगाली मूल के और जनसंघ के सह-संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विरासत का हवाला देने से भी बीजेपी को मज़बूत पकड़ बनाने में आसानी नहीं मिली.
राजनीतिक चर्चा में सांस्कृतिक गौरव के महत्व ने पश्चिम बंगाल में 'अस्मिता' शब्द को भी व्यापक रूप से प्रचलित कर दिया है. इसे कभी नरेंद्र मोदी ने गुजरात में लोकप्रिय बनाया था.
'बंगाली अस्मिता' पर इतना ज़ोर दिया गया है कि कोलकाता में बीजेपी के एक उम्मीदवार को मछली पकड़े हुए प्रचार करते देखा गया. साथ ही बीजेपी नेता स्मृति ईरानी ने गर्व से कहा, "मैं बंगाल के बागची परिवार की बेटी हूं- मुझे हड्डियों वाली मछली खाना आता है."
दूसरी ओर, ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी समेत टीएमसी के अन्य नेताओं ने रैलियों में बार-बार दावा किया कि अगर बीजेपी सत्ता में आती है, तो बंगालियों को मछली और मीट छोड़ना पड़ेगा और शाकाहारी भोजन पर निर्भर रहना पड़ेगा.
उन्होंने यह भी बताया कि हिन्दी भाषी क्षेत्रों में प्रचलित 'जी' कहकर लोगों को संबोधित करना बंगाली संस्कृति का हिस्सा नहीं है.
हाल के समय में, किसी राज्य विधानसभा चुनाव में भाषा, संस्कृति और खान‑पान की आदतों के संरक्षण का मुद्दा जिस हद तक केंद्र में आया है, उसकी शायद कोई मिसाल नहीं मिलती.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.