इतनी कोशिशों के बावजूद गोशालाओं में क्यों दम तोड़ रही हैं गायें?

योगी आदित्यनाथ

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गाय प्रेम किसी से छिपा नहीं है.

गायों के प्रति उनकी इस संवेदनशीलता का ही नतीजा है कि राज्य में सरकार बनने के बाद से ही गायों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और उनकी देखभाल के लिए कई फ़ैसले लिए गए, गोशालाएं बनवाने के निर्देश दिए गए और बजट में अलग से इसके लिए प्रावधान किया गया.

लेकिन राज्य का शायद ही कोई ऐसा इलाक़ा हो जहां से आए दिन गायों-बछड़ों के मरने की ख़बर न आती हो, वो भी भूख से मरने की.

राज्य सरकार ने इसी साल सभी गांवों में गोशाला और शहरी इलाक़ों में पक्के आश्रय स्थल बनवाने के निर्देश दिए थे लेकिन ज़्यादातर आश्रय स्थलों में गायें चारे और पानी के अभाव में दम तोड़ दे रही हैं या फिर उन्हें बाहर ही घूमने के लिए छोड़ दिया जा रहा है.

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाक़े में अन्ना पशु वहां के किसानों के लिए पहले सी गंभीर समस्या बने हुए थे, लेकिन अब ये स्थिति और भयावह हो गई है. इसीलिए जब गोवंश आश्रय स्थलों के निर्माण की घोषणा हुई तो सबसे पहले इसकी शुरुआत बुंदेलखंड इलाक़े से ही हुई.

अस्थाई आश्रय स्थल जनवरी में ही बनाए गए लेकिन उन आश्रय स्थलों में शायद ही कोई गाय हो.

क्या हैं ज़मीनी हालात

बांदा ज़िले की नरैनी तहसील के खपटिहा कलां गांव में ऐसे ही एक आश्रय स्थल में दो-चार गायें पड़ी थीं जहां न तो उनके लिए पानी का कोई इंतज़ाम था और न ही चारे का. गायों के आगे हरे चारे के नाम पर कुछ मात्रा में चरी डाल दी गई थी.

गोशाला

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आश्रय स्थल का हाल ये था कि उसकी टिनशेड के सिर्फ़ अवशेष ही बचे दिख रहे थे, बाक़ी पूरा ढांचा उड़ चुका था.

गांव की प्रधान पूनम सिंह के प्रतिनिधि बाबूलाल ने बताया, "इसके लिए कुछ भी पैसा सरकार से तो मिला नहीं. जोकुछ अपने पास था चारा-भूसा दिया गया. आख़िर कितने दिनों तक खिलाएंगे इस तरह से. उसके बाद अब गायें फिर से खेतों में घूम रही हैं. वहां कम से कम मरेंगी तो नहीं."

गांव के कुछ लोगों का ये भी कहना था कि जब भी कोई जांच करने के लिए आता है तो गांव से लाकर गायें वहां रख दी जाती हैं और बाद में उन्हें फिर छोड़ दिया जाता है. ये अलग बात है कि गायों की रखवाली के लिए दो लोग वहां तैनात थे लेकिन उनके पास कोई काम नहीं था, क्योंकि गोशाला में गाय नहीं थी.

हालांकि गांव में अब बीस लाख रुपये की लागत से एक स्थाई गोशाला बन रही है जिसमें क़रीब पांच सौ गायों के रहने की व्यवस्था होगी.

फ़िलहाल इस गोशाला में स्थाई टिन शेड लग चुका है, ट्यूबवेल से पानी की व्यस्था की जा रही है और चारा-भूसा रखने के लिए एक छोटा सा गोदाम बन रहा है. लेकिन अभी इसे बनने में क़रीब एक महीना लग जाएगा और तब तक जून-जुलाई की भीषण गर्मी और बरसात गायों को ख़ाली पड़े खेतों में ही काटनी पड़ेगी.

गाय

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चारे की कमी

सूखे की मार झेलते रहे बुंदेलखंड में जानवरों के लिए चारा बड़ी समस्या रही है. जब गाय दूध देना बंद कर देती है तो किसान उसे खुला छोड़ देता है. हर साल इसके चलते सैकड़ों गायें भूखी प्यासी दम तोड़ देती हैं.

जून महीने में गर्मी के विकराल रूप धरने और गोशालाओं में बदइंतज़ामी के चलते अचानक कई जगहों से गायों के मरने की ख़बरें आईं. आगरा, मथुरा, कन्नौज, कानपुर, बांदा, हमीरपुर, महोबा के अलावा पूर्वांचल की भी कई गोशालाओं में गाय-बछड़ों की मौत हो गई.

दरअसल, गोशालाएं ऐसी जगहों पर बनी हैं जहां पेड़ तक नहीं हैं और ऐसी स्थिति में दिन में गोशाला के भीतर भी उनका रहना मुश्किल होता है क्योंकि टिनशेड से भीतर गर्मी और बढ़ जाती है.

आंकड़ों पर ग़ौर करें तो उत्तर प्रदेश में 516 पंजीकृत और क़रीब चार हज़ार अस्थायी गोशाला हैं. पशुपालन विभाग के मुताबिक़ राज्य भर में क़रीब साढ़े सात लाख अन्ना पशु थे जिनमें से आधे पशुओं को आश्रय स्थलों में पहुंचा दिया गया है.

गाय

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पशुपालन विभाग के एक बड़े अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, "कुछ जगहों पर प्रशासनिक सख़्ती के बाद आश्रय स्थलों में पशु तो पहुंचा दिए गए लेकिन भीषण गर्मी में चारे-पानी की जब कोई व्यवस्था नहीं है तो गोशाला संचालक भी सोचते हैं कि गर्मी में मरने की बजाय इन्हें खुला ही छोड़ दिया जाए."

जनवरी में यूपी सरकार ने बजट में गोशालाओं के निर्माण और रखरखाव के लिए 248 करोड़ आवंटित किए थे. इससे पहले, 16 नगर निगमों को 10-10 करोड़ रुपये कान्हा उपवन और चारे के लिए दिया गया था.

पिछले साल 69 शहरी निकायों में गोशालाओं के निर्माण के लिए 10 लाख से 30 लाख रुपये की धनराशि जारी की गई थी लेकिन ज़्यादातर जगहों पर इस धनराशि का उपयोग ही नहीं हुआ. यही नहीं, गोरक्षा के लिए यूपी सरकार ने शराब पर सेस लगाकर 165 करोड़ रुपये वसूलने का भी इंतज़ाम किया है लेकिन गोशालाएं बदइंतज़ामी का शिकार हैं और गायें अभाव में दम तोड़ रही हैं.

हालांकि ऐसा नहीं है कि सभी जगहों पर स्थिति यही हो. महोबा के चरखारी ब्लॉक स्थित गोशाला में दोपहर के तीन बजे भी क़रीब दो सौ गायें और बछड़े चारा खा रहे थे और आराम कर रहे थे.

गोशाला

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हालांकि कुछ दिनों पहले ही ऐसी ख़बरें आई थीं कि इस गोशाला में भी अब तक कई गायें मर चुकी हैं लेकिन गोशाला के कर्मचारी रामसेवक ने बताया कि मुश्किल से दो-चार गायें मरी हैं, वो भी बीमारी से.

गोशाला का संचालन नगर पालिका परिषद चरखारी की ओर से किया जा रहा है.

नगर पालिका के अधिशाषी अधिकारी धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने बीबीसी को बताया, "इस गोशाला में चार सौ दस गायें हैं. हमारे और पशु चिकित्साधिकारी के खाते में सरकार की ओर से साढ़े तीन लाख की धनराशि प्राप्त हुई है. पांच सौ कुंतल भूसा ख़रीदकर गोदाम में रखवा दिया गया है. इनवर्टर, समरसेबल पंप, हरा चारा जैसी और व्यवस्थाएं हुई हैं. छह कर्मचारी हर समय वहां रहते हैं जो कि इनकी देखभाल करते हैं. जहां तक गायों के मरने की ख़बर है तो अब तक केवल तीन गायों की मौत हुई है लेकिन बीमारी की वजह से, न कि भूख की वजह से."

गोशाला

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इस गोशाला में भी दिन में गायें कम थीं लेकिन जैसे ही शाम होने लगी, गायें अपने आप घूमते हुए गोशाला के भीतर प्रवेश करने लगीं.

गोशाला के कर्मचारी इस बात का दावा कर रहे थे और हमसे इसे देखने की गुज़ारिश कर रहे थे जो कि सही निकला. हालांकि यहां भी कुछ बछड़े बहुत ही दयनीय स्थिति में बैठे थो जो पानी पीने में भी असमर्थ थे लेकिन कर्मचारियों का कहना था कि ऐसा कड़ी धूप की वजह से है.

बछड़ा

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कड़ी धूप का कहर

भीषण गर्मी और कड़ी धूप को देखते हुए बुंदेलखंड के कई इलाक़ों में प्रशासन ने ख़ुद ही दिन में गायों को गोशाला से बाहर छोड़ देने के निर्देश दे दिए. बांदा में भी ऐसे निर्देश दिए गए हैं.

बांदा के ज़िलाधिकारी हीरालाल इसकी वजह ये बताते हैं, "गायों को छोड़ा नहीं गया है बल्कि गर्मी की वजह से उन्हें बाहर जाने की एक तरह से छूट दे दी गई है. बाहर पेड़ों की छांव मिलेगी जहां वो बैठ सकती हैं, पानी भी मिल जाएगा. और इस समय तो खेतों में फ़सल वैसे भी नहीं होती तो किसी का नुक़सान भी नहीं होगा."

ज़िलाधिकारी हीरालाल का दावा था कि उनके ज़िले में कोई भी गाय सड़क पर घूमती हुई नहीं मिलेगी लेकिन ज़िलाधिकारी कार्यायल से बाहर निकलते ही, शायद ही कोई ऐसी सड़क हो जहां झुंड में गायें न दिखी हों.

कूड़े के ढेर में पॉलिथीन खाती गायें तो शहरों में आम बात हैं. यह हाल न सिर्फ़ बांदा का बल्कि पूरे बुंदेलखंड का है.

गाय

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राज्य के पशुधन विकास मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी कहते हैं, "गोशालाओं का निर्माण इसीलिए हो रहा है कि गायें सुरक्षित रहें. अब तक इन सब पर कोई काम हुआ नहीं था. थोड़ी बहुत शिकायतें ज़रूर मिल रही हैं लेकिन सब जल्दी ठीक हो जाएगा. जहां बड़े पैमाने पर पशुओं के मरने की ख़बर आई, उनकी जांच कराई गई है लेकिन ऐसा नहीं है कि हर जगह गायें भूख से मर रही हैं. हमारी कोशिश है कि गोशाला में रहने वाली किसी भी गाय को चारे और पानी की कमी न होने पाए."

वहीं राज्य सरकार के एक बड़े अधिकारी का कहना है कि ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि इसकी कोई सम्यक योजना नहीं बनाई गई और बिना योजना के ही लागू कर दिया गया.

उनके मुताबिक़, "तमाम दिक़्क़तें इसी वजह से आ रही हैं. गांवों और स्थानीय निकायों को गोशाला बनाने और उसका संचालन करने का काम तो दे दिया गया लेकिन समय से पैसा न पहुंचना और फंड की कमी की वजह से अव्यवस्था होना स्वाभाविक है."

भैंस

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यहां एक सवाल और महत्वपूर्ण है कि राज्य में गायों की देखभाल के लिए जगह-जगह देखे जाने वाले 'गोरक्षकों' की निगाह बीमारी और भुखमरी की शिकार इन गायों पर क्यों नहीं पड़ती?

इस सवाल पर महोबा ज़िले में अपने को गोरक्षक कहने वाले रवींद्र सिंह कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि गोरक्षक इनकी अनदेखी करते हैं. हम लोग जहां भी बीमार गाय देखते हैं या फिर खुली घूम रही गाय देखते हैं, तो गोशाला में पहुंचाते हैं. अब गोशाला ही बदहाली का शिकार हो जाए तो हम क्या करें?"

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