हमास, हिज़्बुल्लाह और हूती विद्रोहियों से ईरान का क्या रिश्ता है

    • Author, लुईस बारुको
    • पदनाम, वर्ल्ड सर्विस
  • प्रकाशित

एक तरफ़ ग़ज़ा में युद्ध जारी है, दूसरी ओर पूरे मध्य पूर्व में ईरान जो भूमिका निभा रहा है, उसने दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है.

इसराइल ग़ज़ा संघर्ष में ईरान हमास के समर्थन में है, उसने इराक़, सीरिया और पाकिस्तान पर मिसाइलें दागी हैं और रूस इसके हथियारों को यूक्रेन के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहा है.

हालांकि ईरान ने मध्य पूर्व में हुए कुछ हमलों में अपनी संलिप्तता से इनकार किया है, जैसे लेबनान से इसराइल पर हमले, जॉर्डन में अमेरिकी सैनिकों पर ड्रोन हमला और यमन में ईरान समर्थित गुटों की ओर से लाल सागर में पश्चिमी देशों के पोतों को निशाना बनाना.

लेकिन कौन हैं ये ताक़तें और इन संघर्षों में ईरान किस तरह शामिल है?

किन ताक़तों को ईरान का समर्थन है?

मध्य पूर्व में ऐसे कई हथियारबंद ग्रुप हैं जिनका ईरान से संबंध है. इनमें ग़ज़ा में हमास, लेबनान में हिज़्बुल्लाह और यमन में हूती विद्रोही हैं. इनके अलावा इराक़, सीरिया और बहरीन में कई ग्रुप हैं.

'एक्सिस ऑफ़ रेजिस्टेंस' (प्रतिरोध की धुरी) के नाम से प्रचारित इनमें से कई ग्रुपों को पश्चिमी देशों ने चरमपंथी घोषित कर रखा है.

थिंक टैंक क्राइसिस ग्रुप में ईरान मामलों के एक्सपर्ट अली वाएज़ के अनुसार, इन सबका एक ही मकसद है- "अमेरिकी और इसराइली ख़तरे से क्षेत्र की रक्षा करना."

वो कहते हैं, "ईरान को सबसे बड़ा ख़तरा अमेरिका से लगता है और फिर इसराइल से, जिसे वो अमेरिका का प्रॉक्सी (छद्म) मानता है."

बीते 28 जनवरी को जॉर्डन में एक ड्रोन हमला हुआ था जिसमें तीन अमेरिकी सैनिक मारे गए थे. ईरान ने इसमें अपने सीधे तौर पर हाथ होने से इनकार किया था. इसकी ज़िम्मेदारी इराक़ में इस्लामिक रेजिस्टेंस ने ली थी, जो कई ग्रुपों का समूह है और जिसमें कुछ को ईरान का समर्थन हासिल है.

सात अक्टूबर को इसराइल पर हमास के हमले के बाद इस इलाके में यह पहला हमला था जिसमें अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई, जिससे अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन पर जवाबी हमले का दबाव बढ़ गया.

इसके एक सप्ताह बाद अमेरिका ने इराक़ और सीरिया में इरानियन रिवोल्यूशनरी गॉर्ड्स कॉर्प्स (आईआरजीसी) कुद्स फ़ोर्स और उससे जुड़े मिलिशिया ग्रुपों पर हमला किया और यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों पर अमेरिका और ब्रिटेन ने संयुक्त हवाई हमले किए.

हालांकि किसी एलानिया जंग में शामिल हुए ईरान को तीन दशक से अधिक बीत चुके हैं लेकिन अन्य संघर्षों में उसका नाम लगातार आता है.

प्रॉक्सी ग्रुपों से अपने सीधे संबंध से ईरान लगातार इनकार करता रहा है. फिर भी 45 साल पहले हुई इस्लामिक क्रांति के बाद से ही उसने चरमपंथी समूहों का समर्थन करना शुरू कर दिया और 1980 के दशक में देश की सुरक्षा रणनीति का वे अहम हिस्सा बन गए.

ईरान का इतिहास और अमेरिका से रिश्ते

दो घटनाएं ऐसी हैं जिसने ईरान और पश्चिमी देशों के रिश्तों को परिभाषित किया.

साल 1979 में ईरानी क्रांति के बाद वो पश्चिमी देशों से अलग थलग पड़ गया.

वॉशिंगटन में जिमी कार्टर प्रशासन, ईरान की राजधानी तेहरान में क़रीब एक साल तक बंधक बनाए गए 52 अमेरिकी राजनयिकों को छुड़ाने के लिए बेचैन था.

और यहीं से एक धारणा बनी कि ईरान को सज़ा देनी चाहिए और अंतरराष्ट्रीय मंच से अलग थलग करना चाहिए.

इसकी वजह से अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी देशों ने ईरान के बदले इराक़ का समर्थन किया, जहां 1979 से 2003 तक सद्दाम हुसैन का शासन था.

इस बीच ईरान और इराक़ के बीच युद्ध भड़क गया जो 1980 से 1988 के बीच आठ साल तक चला. अंत में दोनों ने शांति समझौता किया लेकिन इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ी. दोनों तरफ़ के दस लाख लोग मारे गए और ईरान की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई.

इस घटना ने ईरान के शीर्ष अधिकारियों में ये धारणा बनाई कि भविष्य में किसी भी हमले से निपटने में तेहरान को कई तरह के तरीक़े अख़्तियार करने चाहिए, जिनमें बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम और प्रॉक्सी हथियारबंद ग्रुप शामिल हैं.

इस नज़रिए को तब और बल मिला जब अमेरिका और पश्चिमी देशों ने 2001 में अफ़ग़ानिस्तान और 2003 में इराक़ पर हमला कर दिया और 2011 में पूरे अरब जगत में आंदोलन फूट पड़ा.

ईरान क्या चाहता है?

सैन्य क्षमता के हिसाब से ईरान अमेरिका के मुकाबाले बहुत कमज़ोर माना जाता है, इसलिए कई जानकारों का मानना है कि यह कथित प्रतिरोध रणनीति ईरान सरकार के वजूद का मुख्य आधार है.

मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट में ईरान प्रोग्राम के फ़ाउंडिंग डायरेक्टर एलेक्स वाटांका का कहना है, "ईरान और एक्सिस ऑफ़ रेजिस्टेंस अमेरिका से कभी भी एलानिया जंग नहीं चाहते हैं. ईरान अमेरिका को मध्य पूर्व से बाहर धकेलना चाहता है. उसे थकाने की उनकी यह लंबी अवधि की रणनीति है."

ब्रिटेन में ससेक्स यूनिवर्सिटी के कामरान मार्टिन का तर्क है कि ईरान दुनिया में एक ताक़तवर देश बनना चाहता है.

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सीनियर लेक्चरर कामरान का कहना है कि "प्राचीन ईरान, जिसे पर्शिया या फारस के रूप में जाना जाता था, उसका अतीत बहुत गौरवपूर्ण रहा है और 12 सदियों तक वो पश्चिमी एशिया के देशों में सबसे प्रभुत्वशाली था."

वो कहते हैं, "ईरान का मानना है कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों में वो अहम भूमिका निभाने के काबिल है. पर्शियन कला और साहित्य, एक महान देश और शक्ति होने की ईरान की इस धारणा को बल देता है."

ईरान का कितना नियंत्रण है?

ब्रिटेन की ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में ईरानी मामलों की स्कॉलर और राजनीतिक कार्यकर्ता यासमिन माथर का कहना है कि अपने प्रॉक्सी ग्रुपों पर ईरान का उतना नियंत्रण नहीं है.

यमन में हूती विद्रोहियों का इस्तेमाल एक उदाहरण है, जो लाल सागर में पोतों पर हमले कर रहे हैं.

यासमिन के अनुसार, "वे केवल ईरान का आदेश नहीं मान रहे. इलाक़े में सिर्फ ईरान के प्रॉक्सी के तौर पर नहीं बल्कि एक शक्तिशाली ताक़त के रूप में दिखने का उनका अपना एजेंडा है."

क्राइसिस ग्रुप के अली वाएज़ कहते हैं, "ईरान इस क्षेत्र में अपनी नीतियों को ग़ैर सरकारी तत्वों के सहारे पूरा करता है लेकिन इनके नेटवर्क पर उसका नियंत्रण नहीं है."

वो कहते हैं, "ये धारणा है कि पूरे इलाक़े में इस तरह की गतिविधियां चलाने वाला मास्टरमाइंड ईरान है. लेकिन ईरान और इसके सहयोगी कोई भी रणनीतिक मकसद नहीं हासिल कर सके हैं. चाहे ग़ज़ा में संघर्ष विराम हो या इलाक़े से अमेरिका को निकालना हो."

हालांकि ईरान के पास परमाणु कार्यक्रम है जो 20 सालों में सबसे आधुनिक स्टेज पर है और यह इसराइल और पश्चिम के लिए बड़ी समस्या है.

तीसरा विश्व युद्ध?

मध्य पूर्व में जंग, संघर्ष और हमले जैसे जैसे बढ़ रहे हैं, तृतीय विश्व युद्ध का शब्द भी सर्च में आने लगा है.

वाटांगा का कहना है कि ईरान को सावधानी बरतना होगा क्योंकि हाल के सालों में सरकार के ख़िलाफ़ महिलाओं के अभूतपूर्व आंदोलन के बाद उसकी खुद की सीमाओं पर भारी दबाव है.

उनके अनुसार, "ईरान इस इलाक़े में जो कुछ कर रहा है उसे लेकर जनता में भारी गुस्सा है."

विदेशी मामलों की यूरोपीय काउंसिल में मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ़्रीकी प्रोग्राम की उप प्रमुख एली गेरान्माये का तर्क है कि पश्चिम भी ईरान ने भिड़ना नहीं चाहता.

उनके मुताबिक, "अमेरिकी राष्ट्रपति, चुनाव के दौरान ये ख़तरा नहीं उठा सकते. इसराइल भी हिम्मत नहीं कर सकता क्योंकि ग़ज़ा में युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय समर्थन बहुत नाज़ुक दौर में है."

विशेषज्ञों का मानना है कि जंग किसी भी पक्ष का एजेंडा नहीं है.

"एक दूसरे को निशाना बनाने के लिए अमेरिका और ईरान इलाक़ाई शक्तियों का इस्तेमाल कर रहे हैं. ऐसा करते हुए वो सतर्कता भी बरत रहे हैं कि कहीं जंग न भड़क जाए, जिसके नतीजे भयावह हो सकते हैं."

एली गेरान्माये के अनुसार, "बिना गंभीर कूटनीति के वॉशिंगटन और तेहरान एक दूसरे को युद्ध के रास्ते पर खींच कर ले जाएंगे. और अगर एक देश बहुत सतर्कता और नियंत्रित रूप से बर्ताव न करे तो संघर्ष और फैल सकता है."

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